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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Anapatya to aahlaada only)

by

Radha Gupta, Suman Agarwal, Vipin Kumar

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Anapatya - Antahpraak (Anamitra, Anaranya, Anala, Anasuuyaa, Anirudhdha, Anil, Anu, Anumati, Anuvinda, Anuhraada etc.)

Anta - Aparnaa ((Antariksha, Antardhaana, Antarvedi, Andhaka, Andhakaara, Anna, Annapoornaa, Anvaahaaryapachana, Aparaajitaa, Aparnaa  etc.)

Apashakuna - Abhaya  (Apashakuna, Apaana, apaamaarga, Apuupa, Apsaraa, Abhaya etc.)

Abhayaa - Amaavaasyaa (Abhayaa, Abhichaara, Abhijit, Abhimanyu, Abhimaana, Abhisheka, Amara, Amarakantaka, Amaavasu, Amaavaasyaa etc.)

Amita - Ambu (Amitaabha, Amitrajit, Amrita, Amritaa, Ambara, Ambareesha,  Ambashtha, Ambaa, Ambaalikaa, Ambikaa, Ambu etc.)

Ambha - Arishta ( Word like Ayana, Ayas/stone, Ayodhaya, Ayomukhi, Arajaa, Arani, Aranya/wild/jungle, Arishta etc.)

Arishta - Arghya  (Arishtanemi, Arishtaa, Aruna, Arunaachala, Arundhati, Arka, Argha, Arghya etc.)           

Arghya - Alakshmi  (Archanaa, Arjuna, Artha, Ardhanaareeshwar, Arbuda, Aryamaa, Alakaa, Alakshmi etc.)

Alakshmi - Avara (Alakshmi, Alamkara, Alambushaa, Alarka, Avataara/incarnation, Avantikaa, Avabhritha etc.)  

Avasphurja - Ashoucha  (Avi, Avijnaata, Avidyaa, Avimukta, Aveekshita, Avyakta, Ashuunyashayana, Ashoka etc.)

Ashoucha - Ashva (Ashma/stone, Ashmaka, Ashru/tears, Ashva/horse etc.)

Ashvakraantaa - Ashvamedha (Ashwatara, Ashvattha/Pepal, Ashvatthaamaa, Ashvapati, Ashvamedha etc.)

Ashvamedha - Ashvinau  (Ashvamedha, Ashvashiraa, Ashvinau etc.)

Ashvinau - Asi  (Ashvinau, Ashtaka, Ashtakaa, Ashtami, Ashtaavakra, Asi/sword etc.)

Asi - Astra (Asi/sword, Asikni, Asita, Asura/demon, Asuuyaa, Asta/sunset, Astra/weapon etc.)

Astra - Ahoraatra  (Astra/weapon, Aha/day, Ahamkara, Ahalyaa, Ahimsaa/nonviolence, Ahirbudhnya etc.)  

Aa - Aajyapa  (Aakaasha/sky, Aakashaganga/milky way, Aakaashashayana, Aakuuti, Aagneedhra, Aangirasa, Aachaara, Aachamana, Aajya etc.) 

Aataruusha - Aaditya (Aadi, Aatma/Aatmaa/soul, Aatreya,  Aaditya/sun etc.) 

Aaditya - Aapuurana (Aaditya, Aanakadundubhi, Aananda, Aanarta, Aantra/intestine, Aapastamba etc.)

Aapah - Aayurveda (Aapah/water, Aama, Aamalaka, Aayu, Aayurveda, Aayudha/weapon etc.)

Aayurveda - Aavarta  (Aayurveda, Aaranyaka, Aarama, Aaruni, Aarogya, Aardra, Aaryaa, Aarsha, Aarshtishena, Aavarana/cover, Aavarta etc.)

Aavasathya - Aahavaneeya (Aavasathya, Aavaha, Aashaa, Aashcharya/wonder, Aashvin, Aashadha, Aasana, Aasteeka, Aahavaneeya etc.)

Aahavaneeya - Aahlaada (Aahavaneeya, Aahuka, Aahuti, Aahlaada etc. )

 

 

अर्चना अग्नि २०१( नवव्यूह अर्चन विधि ), ३०१( सूर्य अर्चना विधान ), ३४८१५( नव दुर्गा अर्चना का कथन ), गरुड १.१६.९( सूर्य अर्चना मन्त्र ), १.२१+ ( शिव अर्चना की विधि ), भविष्य १.६६( सूर्य अर्चना का माहात्म्य ), १.६७.१( सूर्य अर्चना की विधि ), १.२००+ ( सूर्य अर्चना की विधि ), १.२१२+ ( सूर्य अर्चना की विधि ), भागवत ६.८.१७( नारद द्वारा अर्चना - अपराधों से रक्षा का उल्लेख ), वामन १६.३०( अष्टमी/नवमी को शिव पूजा विधान का कथन ), विष्णु ३.८( विष्णु अर्चना की विधि व फल ), विष्णुधर्मोत्तर १.६३( अर्चना विधि ), २.९०( देवकर्म में प्रयुक्त मन्त्रों का कथन ), २.९१( अर्चना में निषिद्ध द्रव्य ), ३.१( चित्रसूत्र अर्चन विधि ), ३.११२( विष्णु अर्चना हेतु मन्त्र ), ३.३१३( मधुपर्क द्वारा विष्णु की अर्चना ), ३.११४( विष्णु अर्चना, इज्या ), शिव २.१.११( शिव अर्चना का माहात्म्य ), स्कन्द ३.२.९.३५( अर्चनाना : आत्रेय गोत्र का एक प्रवर, ऋग्वेद में ऋषि ), योगवासिष्ठ ६.१.३९( स्व देह रूपी देह अर्चन का विधान ), द्र. आराधना, पूजा Archanaa

 

अर्चि भागवत ४.१५.५( वेन की बाहुओं के मन्थन से अर्चि की उत्पत्ति, लक्ष्मी का अंश, पृथु - भार्या ), ४.२२.५३( पृथु - भार्या, विजिताश्व आदि ५ पुत्रों की माता ), ४.२३.१९( पति की मृत्यु पर अर्चि के पति शरीर के साथ चिता में भस्म होने का वर्णन ), ६.६.२०( कृशाश्व - पत्नी, धूम्रकेश - माता ), स्कन्द १.२.५.१३५( अर्चि व धूम मार्ग का निरूपण ), ७.१.१५०.५०( २३वें कल्प का नाम ), वा.रामायण ४.४२.४( अर्चिमाल्य : वानरगण का नाम, मरीचि - पुत्र, पश्चिम दिशा में सीता के अन्वेषण हेतु गमन ), लक्ष्मीनारायण ३.३६.१( अर्चिमार्ग वत्सर में विद्युन्नारायण अवतार द्वारा विद्युत्स्राव राक्षस का नाश ), द्र शतर्चि Archi

Remarks on Archi 

अर्चिष्मती ब्रह्माण्ड २.३.७१.१६८( सारण - पुत्री ), स्कन्द ४.१.१०.२८( अग्नि की अर्चिष्मती पुरी प्राप्ति के उपाय का वर्णन )

 

अर्चिष्मान् वायु १००.१५( वैवस्वत मन्वन्तर में सुतपा नामक देवगण में से एक ), वा.रामायण ४.४२.४( वानर, मरीचि - पुत्र, पश्चिम दिशा में सीता का अन्वेषण )

 

अजदन्त लक्ष्मीनारायण २.८.३३( राक्षस का नाम, कृष्ण को मारने की चेष्टा, पूर्व जन्म का वृत्तान्त )

 

अर्जुन कूर्म १.२९+ ( द्वैपायन व्यास द्वारा अर्जुन को चतुर्युगों में धर्म की स्थिति व शिव भक्ति का उपदेश ), गरुड ३.२८.१८(मन्त्रद्युम्न नामक षष्ठम इन्द्र का अवतार) नारद १.५६.२०७( अर्जुन वृक्ष की स्वाती नक्षत्र से उत्पत्ति ), पद्म १.१४( विष्णु के रक्त से अर्जुन की उत्पत्ति की कथा ), ब्रह्म १.१०३( कृष्ण - पत्नियों की आभीरी से रक्षा में अर्जुन की असफलता ), भविष्य ३.३.१.२५( कलियुग में परिमल - पुत्र ब्रह्मानन्द के रूप में अवतरण ), ४.५८.४१( पर्जन्य वृष्टि से योगी कार्तवीर्य का अर्जुन बनना ), भागवत १.७( अश्वत्थामा द्वारा द्रौपदी - पुत्रों की हत्या के पश्चात् अर्जुन द्वारा अश्वत्थामा के निग्रह व मणि आहरण की कथा ), ८.५.२( पांचवें मन्वन्तर में रैवत मनु - पुत्र ), १०.९( यमलार्जुन : कृष्ण द्वारा उखल से उद्धार, पूर्व जन्म का चरित्र ), १०.८६( अर्जुन द्वारा सुभद्रा हरण का प्रसंग ), १०.८९( अर्जुन का द्वारका में ब्राह्मण बालक की प्राण रक्षा का उद्योग, असफलता, कृष्ण द्वारा रक्षा ), ११.१६.३५( विभूति योग के अन्तर्गत कृष्ण के वीरों में अर्जुन होने का उल्लेख ), मार्कण्डेय २.३७( अर्जुन व भगदत्त के युद्ध में अर्जुन के बाण से तार्क्षी की मृत्यु, तार्क्षी के चार पुत्रों की भगदत्त के घण्टे से रक्षा ), वराह ८(धर्मव्याध - पुत्री अर्जुनका के मतङ्ग - पुत्र से विवाह का वर्णन), विष्णु ५.३८( द्वारका वासियों की दस्युओं से रक्षा करने में अर्जुन की असफलता ), शिव ३.३७.५३+ ( व्यास द्वारा अर्जुन को शिव आराधना हेतु इन्द्रकील पर्वत पर जाने की प्रेरणा व शक्र विद्या का दान ), ३.३९( अर्जुन व शिव द्वारा शूकर रूपी मूक दैत्य को एक साथ बाण मारना ), ३.४०+ ( अर्जुन का किरात वेश धारी शिव से युद्ध, शिव का अभिज्ञान होने पर शिव - स्तुति, वर प्राप्ति, प्रत्यागमन ), ५.३४.३१( दया व तामस? के पुत्रों में से एक? ), स्कन्द १.२.१( ग्राह योनि से ग्रस्त पांच अप्सराओं का अर्जुन द्वारा उद्धार ), २.१.२९+ ( अर्जुन द्वारा प्रतिज्ञा भङ्ग के कारण तीर्थ यात्रा, सुवर्णमुखरी तट पर भरद्वाज से वार्तालाप ), ५.१.३.२५( नीललोहित रुद्र द्वारा विष्णु की भुजा से स्रवित रक्त से कपाल को भरना, कपाल से अर्जुन रूपी नर का प्राकट्य ), ५.१.३२( अर्जुन द्वारा उज्जयिनी में नरादित्य मूर्ति की स्थापना, इन्द्र से मूर्ति द्वय प्राप्ति की कथा, सूर्य का स्तवन ), ६.१५२( अर्जुन द्वारा ब्राह्मणों की गायों की रक्षा, चक्रपाणि प्रासाद की स्थापना ), हरिवंश २.७( कृष्ण द्वारा अर्जुन वृक्ष के उद्धार का प्रसंग ), २.१११( पाण्डव अर्जुन की ब्राह्मण बालक की काल से रक्षा में असफलता ), योगवासिष्ठ ६.१.५३+ ( कृष्ण द्वारा अर्जुन को वासना त्याग आदि के उपदेश का वर्णन ), द्र. मलयार्जुन, मल्लिकार्जुन, यमलार्जुन, सहस्रार्जुन, हैहयराज अर्जुन Arjuna

अर्जुन - (१) ये नरस्वरूप हैं ( आदि० १ । १ ) । इनको धर्ममय विशाल वृक्ष का तना कहा गया है ( आदि० १ । ११० ) । ये पाण्डु के क्षेत्रज पुत्र हैं । इन्द्र के द्वारा कुन्ती के गर्भ से इनकी उत्पत्ति हुई है ( आदि० ६३ । ११६)। ये इन्द्र के अंश से प्रकट हुए हैं ( आदि० ६७ । १११) । फाल्गुन मास तथा दोनों फाल्गुनी के संधिकाल में इनकी उत्पत्ति हुई, इसी से इनका नाम 'फाल्गुन' हुआ ( आदि० १२२ । ३५ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) । आकाशवाणी द्वारा इनकी जन्मकाल में प्रशंसा ( आदि० १२२ । ३८-४६ ) । इनके जन्मोत्सव पर समस्त देवताओं, गन्धर्वों, आदित्यों, रुद्रों, वसुओं, नागों तथा ऋषियों का शुभागमन और प्रमुख अप्सराओं द्वारा नृत्य-गान ( आदि० १२२ । ५० ७४ ) । शतशृङ्गनिवासी ऋषियों द्वारा इनका नामकरण-संस्कार ( आदि० १२३ । २० ) । वसुदेव के पुरोहित काश्यप के द्वारा इनके उपनयनादि-संस्कार । राजर्षि शुक से इनके द्वारा धनुर्वेद का अध्ययन। (आदि० १२३ । ३१ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) । इनके द्वारा द्रौपदी के गर्भ से श्रुतकीर्ति का जन्म ( आदि ० ९५ ।   ७५ ) । सुभद्रा के गर्भ से अभिमन्यु की उत्पत्ति ( आदि० ९५ । ७८ ) । कृपाचार्य से इन ( पाण्डवों ) का अध्ययन (आदि०  १२९ । २३) । अर्जुन आदि का द्रोणाचार्य की शिष्यता में अध्ययन ( आदि० १३१ । ४) । अर्जुन द्वारा गुरु के अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने की प्रतिज्ञा (आदि ० १३१ | ७ ) । आचार्य का अर्जुन को हृदय से लगाकर उनके प्रति हार्दिक स्नेह प्रकट करना । इनकी अध्ययननिष्ठा तथा सर्वाधिक योग्यता ( आदि० १३१ । १३-१४ ) । इनसे कर्ण की स्पर्धा (आदि० १३१ । १२ ) । अर्जुन अनुपम प्रतिभाशाली हैंऐसी द्रोणाचार्य की धारणा (आदि० १३१ । १५) । ये अपनी गुरुभक्ति तथा अस्त्रों के अभ्यास की लगन के कारण गुरु के विशेष प्रिय हुए ( आदि० १३१ । २० ) | इनके द्वारा रात्रि में धनुर्विद्या का अभ्यास ( आदि० १३१ । २५) । इनको अद्वितीय धनुर्धर बनाने के लिये द्रोणाचार्य का आश्वासन (आदि० १३१ । २७ ) । एकलव्य की धनुर्विद्या से इनकी चिन्ता और द्रोण से इनका उलाहना ( आदि० १३१ । ४८-४९ ) । समस्त युद्ध-विद्याओं में इनकी कुशलता (आदि०     १३१ । ६३ ) । ये सर्वश्रेष्ठ अस्त्राभ्यासी और गुरुभक्त थे ( आदि० १३१ । ६४ ) | द्रोणाचार्य द्वारा इनकी लक्ष्यवेध के विषय में परीक्षा तथा इनके द्वारा गीध के मस्तक का छेदन ( आदि० १३२ । १--९)। द्रोणाचार्य पर आक्रमण करने वाले ग्राह का इनके द्वारा वध ( आदि० १३२ । १७ ) । द्रोणाचार्य द्वारा प्रसन्न होकर इनको 'ब्रह्मशिर' नामक अस्त्र का दान ( आदि० १३२ । १८ ) । रङ्गभूमि में इनके अद्भुत अस्त्रकौशल (आदि० १३४।१८ - २५) । रङ्गभूमि में कर्ण को इनकी फटकार ( आदि० १३५ | १८ ) । कर्ण से लड़ने के लिये रङ्गभूमि में इनका उद्यत होना (आदि० १३५ | २१ ) | इनके द्वारा मन्त्रिसहित द्रुपद की पराजय और उन्हें बंदी बनाकर द्रोणाचार्य को सौंपना ( आदि० १३७ ।६३ ) । इनका द्रुपद की 'अहिच्छत्रा' नगरी को जीतकर उसे द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा के रूप में देना ( आदि० १३७ । ७७ ) | 'ब्रह्मशिर' नामक अस्त्र की परम्परा तथा उसके उपयोग का नियम बतलाकर द्रोणाचार्य का अर्जुन को विरोधी होनेपर अपने साथ भी लड़ने के लिये वचनद्ध करना ( आदि० १३८ । ९-१५ ) । इनके द्वारा यवनराज, सौवीरनरेश विपुल और सुमित्र के वध आदि पराक्रम का धृतराष्ट्र द्वारा चिन्तन ( आदि० १३८ । २०-२३ ) । हिडिम्ब के साथ युद्ध होते समय भीमसेन की सहायता के लिये इनका उद्यत होना ( आदि० १५३।१८-१९ ) । द्रौपदी को इन्हें समर्पित करने के लिये द्रुपद का संकल्प तथा लाक्षागृह में इनकी मृत्यु होने का समाचार सुनकर द्रुपद का शोक ( आदि० १६६ । ५६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ४९३ ) । चित्ररथ गन्धर्व को इनकी फटकार और इनके द्वारा गङ्गा आदि नदियों की महिमा (आदि० १६९।१६ - २४ ) | युद्ध में इनके द्वारा चित्ररथ पर आग्नेयास्त्र का प्रहार और उसकी मूर्छा (आदि० १६९।३१-३३)। चित्ररथ को इनका जीवन दान ( आदि० १६९ । ३७ ) । चित्ररथ के साथ इनकी मित्रता (आदि० १६९३८-५८ ) । चित्ररथ से इन्हें 'चाक्षुषी' विद्या एवं दिव्य अश्व की प्राप्ति ( आदि० १६९ । ४३४६ ) । इन पर चित्रर के आक्रमण का कारण ( आदि० १६९ । ६० ) । चित्ररथ पर इनकी विजय का कारण ( आदि० १६९ । ७१) । किसी श्रोत्रिय ब्राह्मण का पुरोहित रूप में वरण करने के लिये इनको चित्ररथ की सलाह ( आदि० १६९ । ७४ ) । चित्ररथ को इनके द्वारा आग्नेयास्त्र का दान ( आदि० १८२ । ३ ) । पाञ्चाल यात्रा के समय मार्ग में अर्जुन आदि पाण्डवों से व्यासजी की भेंट ( आदि० १८४ २ ) । द्रुपदनगर में अर्जुन आदि पाण्डवों का मातासहित एक कुम्भकार के घर में ठहरना (आदि० १८४ । ६) । द्रौपदी के स्वयंवर में इन्हें लक्ष्यवेध के लिये उद्यत देखकर इनके सम्बन्ध में ब्राह्मणों के ऊहापोह ( आदि० १८७२-१६ ) । स्वयंवर में इनका लक्ष्यवेध और द्रौपदी का इनके गले में जयमाला डालना ( आदि० १८७।२१-८७ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) | स्वयंवर में आये हुए राजाओं के साथ ब्राह्मणवेश में युद्ध करते समय श्रीकृष्ण द्वारा बलरामजी को इनका परिचय देना ( आदि० १८८ । २० ) । स्वयंवर में इनका युद्ध और इनके द्वारा उसकी पराजय ( आदि० १८९ । १०-२२ ) । द्रौपदीके विषय में इनकी युधिष्ठिर से बातचीत ( आदि० १९० । ८-१० ) । द्रौपदी के साथ इन ( पाण्डवों) का विधिपूर्वक विवाह ( आदि० १९७ । १३) । ब्राह्मण के गोधन की रक्षा के लिये इनका आयुधागार में प्रवेश और वनवास ( आदि० २१२ । १९-३५ ) | हरिद्वार में उलूपी द्वारा इनका नागलोक में आकर्षण (आदि० २१३ | १३) । इनके द्वारा उलूपी के गर्भ से 'इरावान्' का जन्म (आदि० २१३ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) । इनका मणिपूर जाकर चित्राङ्गदा से विवाह ( आदि० २१४ । १५-२६ ) । इनके द्वारा चित्राङ्गदा के गर्भ से बभ्रुवाहन का जन्म ( आदि० २१४ | २७ ) । इनका दक्षिण के तीर्थ में जाना और वर्गा आदि अप्सराओं का ग्राह-योनि से उद्धार करना ( आदि० २१५ एवं २१६ अध्यायों में ) । पुनः मणिपुर में आकर इनके द्वारा चित्राङ्गदा को आश्वासन और राजसूय यज्ञ में आने का आदेश (आदि० २१६ । २३-३१) । इनका गोकर्णतीर्थ की ओर जाना (आदि० २१६ । ३४ ) । प्रभासक्षेत्र में इनसे श्रीकृष्ण की भेंट (आदि० २१७ । ३-४ ) । रैवतक पर्वत पर इनका रातभर श्रीकृष्ण के साथ विश्राम ( आदि० २१७ । ८ ) । श्रीकृष्ण के साथ इनका द्वारकागमन (आदि० २१७ । १५) । सुभद्राहरण के विषय में इनके लिये श्रीकृष्ण की सम्मति (आदि० २१८ । २१-२३ ) । सुभद्रा से विवाह के लिये इनको युधिष्ठिर की सम्मति ( आदि० २१८ । २५ ) । इनके द्वारा सुभद्रा का हरण (आदि० २१९ । ७) । इनसे युद्ध करने के लिये वृष्णिवंशियों की तैयारी ( आदि० २१९ | १६-१९ ) । सुभद्रा से इनका विधिपूर्वक विवाह ( आदि० २२० । १३ ) । पुष्करतीर्थ में इनके द्वारा नवास के शेष समय का यापन ( आदि० २२० | १४ ) । सुभद्रा को गोपीवेश में सजाकर उसे द्रौपदी के पास इनका भेजना (आदि० २२० । १९) । श्रीकृष्ण के साथ इनका यमुना में जलविहार ( आदि० २२१ । १४-२० ) । खाण्डववन को जलाने के लिये इनसे ब्राह्मणरूपधारी अग्नि की प्रार्थना (आदि० २२२ । ५- ११ ) । इनका अग्निदेव से दिव्य धनुष और रथ आदि माँगना ( आदि० २२३ । १५-२१ ) | अग्नि का इनको गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस एवं दिव्य रथ देना (आदि० २२४ । ६-१४) । खाण्डवदाहके समय इन्द्र आदि देवताओं के साथ इनका भयानक युद्ध ( आदि० २२६ अ० में ) । इनके द्वारा तक्षक नाग की पत्नी का वध ( आदि० २२६ । ६-८ ) । अश्वसेन (नाग) को इनका शाप ( आदि० २२६ । ११) । इनसे इन्द्र आदि देवताओं की पराजय तथा इन्द्र का स्वर्ग को लौटना (आदि० २२६ । १३-२३ ) । मयासुर को इनका अभयदान ( आदि० २२७ । ४४ ) । इन्द्र द्वारा इन्हें समस्त दिव्यास्त्र प्रदान करने का आश्वासन (आदि० २३३ । १०-१२ ) । अर्जुन और मयासुर की बातचीत ( सभा० १ । २८)। मयासुर द्वारा इनको देवदत्त नामक शङ्ख की भेंट - गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा। देवदत्तं चार्जुनाय शङ्खप्रवरमुत्तमम्।। ( सभा० ३ । २१ ) । जरासंध को जीतने के विषय में युधिष्ठिर को उत्साह दिलाने के लिये वीरोचित उद्गार (सभा० १६ । ७- १७ ) । श्रीकृष्ण और भीमसेन के साथ अर्जुन की मगध- यात्रा ( सभा० २० अ० में ) । इनका दिग्विजय के लिये प्रस्थान ( सभा० २५ । ७ ) । इनके द्वारा कुलिन्द आदि देशों पर विजय तथा भगदत्त की पराजय ( सभा० २६ अ० में ) । अन्तर्गिरि, उलूकपुर, मोदापुर आदि देशों पर इनकी विजय ( सभा० २७ अ० में ) । किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरु पर विजय प्राप्त करके इनका इन्द्रप्रस्थ लौटना ( सभा० २८ अ० में )। राजसूय के बाद अर्जुन का द्रुपद को कुछ दूर पहुँचाना ( सभा० ४५ । ४८)। कर्ण और उसके अनुगामियों को तथा समस्त विपक्षियों को मारने के लिये अर्जुन की प्रतिज्ञा ( सभा० ७७ । ३२३६ ) । वनयात्रा के समय अर्जुन का बालू उड़ाते हुए जाने का रहस्य - सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति। ( सभा० ८० । ५-१५)। इनके द्वारा श्रीकृष्ण का स्तवन ( वन० १२ । ११-४३)। इनके द्वारा द्रौपदी को आश्वासन ( वन० १२ । १३३)। इनका वन में साथ गये हुए प्रजावर्ग को आश्वासन ( वन० २३ । १३-१४ ) । द्वैतवन में निवास करने के लिये युधिष्ठिर को इनकी सलाह ( वन० २४ । ५- ११ ) । तप के लिये प्रस्थान और इन्द्रकील पर इनकी इन्द्र से भेंट, बातचीत तथा इन्हें इन्द्र का वरदान ( वन० ३७ । ३७-५८ ) । इनकी चार मास तक उग्र तपस्या (वन० ३८ । २२-२७)। इनके द्वारा मूक दानव का वध ( ३९ । ७-१६)। किरातरूपधारी भगवान् शङ्कर के साथ इनका युद्ध ( वन० ३९ । ३२-६४ ) । इनके द्वारा शिवजी की स्तुति ( वन० ३९ । ७४-८२ ) । इनकी पाशुपतास्त्र के लिये महादेवजी की प्रार्थना ( वन० ४० । ८ ) । इन्हें पाशुपतास्त्र की प्राप्ति ( वन० ४० । २१ ) । इन्हें यम द्वारा दण्डास्त्र की प्राप्ति ( वन० ४१ । २५-२६ ) । वरुण द्वारा पाश-अस्त्र की प्राप्ति ( वन० ४१ । ३१-३२)। कुबेर द्वारा अन्तर्धानास्त्र की प्राप्ति ( वन० ४१ । ४१ )। इन्द्र का इन्हें स्वर्ग में चलने का आदेश ( वन० ४१ । ४३- ४४ )। अर्जुन के चिन्तन करने पर मातलि द्वारा इन्द्र के रथ का आनयन और उस पर बैठकर इनका स्वर्गलोक के लिये प्रस्थान ( वन० ४२ । १० ३१ ) । स्वर्गलोक में पहुँचने पर इनका महान् स्वागत तथा इन्द्रसभा में पहुँचकर इनका इन्द्रदेव से मिलना ( वन० ४३ । ८१५ ) इन्द्रभवन में इन्हें अस्त्र और संगीत की शिक्षा (वन० ४४ ।३ ११ ) । अर्जुन के सत्कार के लिये इन्द्र का चित्रसेन द्वारा उर्वशी को संदेश एवं आदेश ( वन० ४५ अ० में ) । उर्वशी का कामपीड़ित होकर अर्जुन के पास जाना और अपने आने का कारण बताना ( वन० ४६ । २२ ३५)। अर्जुन का उर्वशी का प्रस्ताव सुनकर दोनों हाथों से आँख बंद कर लेना और इसकी ओर देखने का कारण बताते हुए उसे 'पूरुवंश की जननी' कहना, साथ ही उसे अपने लिये कुन्ती, माद्री और शची का स्थान देना ( वन० ४६ । ३६४७ ) । उनके अस्वीकार करने पर उर्वशी का इन्हें शाप देकर लौट आना (वन० ४६ अ० में ) । अर्जुन को इन्द्र का आश्वासन ( वन० ४६ । ५५-५९ ) । इनकी युधिष्ठिर की रक्षा के लिये महर्षि लोमश से प्रार्थना ( वन० ४७ । ३२-३३ ) । इन्द्रलोक से लौटकर इनका गन्धमादन पर्वत पर भाइयों से मिलना ( वन० १६५ । ४ ) । इनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्रा और पाशुपतास्त्र की प्राप्ति का वर्णन (वन० १६७ अ० में ) । इनका इन्द्रलोक में प्राप्त हुई अस्त्रशिक्षा आदि का वृत्तान्त ( वन० १६८ अ० में ) । निवातकवचों के साथ अपने युद्ध का वर्णन ( वन० १६९ अ० से १७२ अ० तक ) । अपने द्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोमों और कालकेयों के वध का वृत्तान्त बताना ( वन १७३ अ०में ) । इनका भाइयों को दिव्यास्त्रों का प्रयोग दिखाने के लिये उद्यत होना ( वन० १७५ । ७ )। गन्धर्वों के हाथ से कौरवों को छुड़ाने के लिये अर्जुन की प्रतिज्ञा ( वन० २४३ | २१ ) | अर्जुन का गन्धर्वों से दुर्योधन को छोड़ने के लिये कहना और न छोड़ने पर उनके ऊपर बाण बरसाना ( वन० २४४ । १२ २१ ) । इनके द्वारा चित्रसेन गन्धर्व की पराजय ( वन० २४५ । १२६)। जयद्रथ के अनुगामी पाँच सौ पर्वतीय महारथियों का संहार ( वन० २७१ । ८ ) । सौवीरदेश के बारह राजकुमारों का वध ( वन० २७१ । २७ ) । शिबि, इक्ष्वाकु, त्रिगर्त और सिन्धुदेश के क्षत्रियों का विनाश ( वन० २७१ । २८ ) । द्वैतवन में पानी लाने के लिये जाना और सरोवर पर मूर्च्छित होना ( वन० ३१२ । २२ - ३२ ) । अर्जुन का युधिष्ठिर को अज्ञातवास के लिये कुछ उपयोगी राज्यों के नाम बताना ( विराट० १ । १२-१३ ) । विराटनगर में 'बृहन्नला' नाम से रहने की बात बताना ( विराट० २ । २५- २७) । नपुंसक वेष में राजा विराट के पास जाना और उनसे अपने यहाँ रखने के लिये प्रार्थना करना ( विराट० ११ । २९ ) । बृहन्नला रूप में इनका द्रौपदी से अपना मनोगत दुःख प्रकट करना (विराट० २४ । २३२५) । अपने आप ( बृहन्नला ) को सारथि बनाने के लिये द्रौपदी द्वारा इनका उत्तर को कहलाना (विराट० ३६ । १०१३) उत्तर का सारथि बनकर युद्ध के लिये प्रस्थान ( विराट० ३७ । २७ ) । भयभीत होकर भागते हुए उत्तर को दौड़कर पकड़ना ( विराट० ३८ । ४० ) । उत्तर को समझा-बुझाकर अपना सारथि बनाकर रथ पर चढ़ाना ( विराट० ३८ | ४६ ५१ ) । शमीवृक्ष से अस्त्र उतारने के लिये उत्तर को आदेश देना ( विराट० ४० । ३ ) । उत्तर को पाण्डवों के दिव्यायुधों का परिचय देना ( विराट० ४३ अ० में ) । उत्तरकुमार से अपने भाइयों का परिचय देना तथा अपने दस नामों की पृथक-पृथक व्याख्या करना ( विराट० ४४ । १३२२ ) । उत्तर से अपनी नपुंसकता का कारण बताना ( विराट० ४५ । १३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ १५ तक ) । अपने अस्त्रों का स्मरण करना और आने पर उनसे वार्तालाप (विराट० ४५ । २७-२८) । इनका शङ्ख बजाना और डरे हुए उत्तर को धीरज देना ( विराट० ४६ । ८ -२३ ) । बाणों द्वारा आचार्य द्रोण को प्रणाम करना और युद्ध की आज्ञा माँगना ( विराट० ५३ । ७ ) । कौरवसेना पर आक्रमण करके विराट की गौओं को लौटा लेना ( विराट० ५३ । २४-२५) । कर्ण पर आक्रमण ( विराट० ५४ । ४-५ ) । इनके द्वारा विकर्ण की पराजय ( विराट० ५४ । ९-१० ) । राजा शत्रुतप का वध ( विराट० ५४ । ११ - १३ ) । कर्ण के भाई संग्रामजित् का वध ( विराट० ५४ । १८ ) । कर्ण की पराजय ( विराट० ५४ । १९ ३६ ) । कौरवसेना का संहार करके उसे खदेड़ देना (विराट० ५५ । १३८ ) । उत्तर को कौरववीरों का परिचय देकर कृपाचार्य के पास जाना ( विराट० ५५ । ४१६० ) । कृपाचार्य को रथहन और घायल करना ( विराट० ५७ । ३६-३८ ) । द्रोणाचार्य के साथ युद्ध और उन्हें घायल करना ( विराट० ५८ अ० में ) । अश्वत्थामा के साथ युद्ध और उनके बाों को समाप्त कर देना ( विराट० ५९ । १ १५ ) । कर्ण के साथ पुनः युद्ध और उसे घायल करके खदेड़ना (विराट० ६० अ० में ) । उत्तर के हतोत्साह होने पर उसे आश्वासन देकर भीष्म के पास जाना और उनका ध्वज काट गिराना (विराट० ६१ । १३ - ३५ ) । दुःशासन को घायल करना ( विराट० ६१ । ४० ) । विकर्ण को रथ से नीचे गिराना ( विराट० ६१ । ४२ ) । दुःसह और विविंशति को घायल करना ( विराट० ६१ ।४५ )। रणभूमि में रक्त की नदी प्रकट कर देना (विराट० ६२।१७-२१ ) । समस्त कौरव महारथियों को पराजित करना (विराट० ६३ । १-१४ ) । भीष्म के साथ अद्भुत युद्ध और उन्हें घायल करके युद्ध से विमुख करना (विराट० ६४ अ० में ) । पुनः उनके द्वारा विकर्ण की पराजय ( विराट० ६५ । १० ) । दुर्योधन की पराजय ( विराट० ६५ । १३ ) । सम्मोहनास्त्र के द्वारा इनका सभी कौरव महारथियों को मोहित कर देना (विराट० ६६ । ८-११ ) । युद्ध बंद होने पर इनके द्वारा भीष्म आदि श्रेष्ठ पुरुषों का अभिवादन एवं सम्मान ( विराट० ६६ । २५-२६ ) । दुर्योधन के मुकुट का खण्डन ( विराट० ६६ । २७ ) । उत्तर से अपना रहस्य न खोलने के लिये कहना ( विराट० ६७ । ९-१०)। उत्तरा को कौरव महारथियों के वस्त्र देना ( विराट० ६९ । १६) । विराट को युधिष्ठिर का परिचय देना ( विराट० ७० । ९-२८ ) । अन्य चारों पाण्डवों और द्रौपदी का परिचय देना ( विराट० ७१ । ३-१० ) । उत्तर द्वारा अर्जुन के पराक्रम का वर्णन ( विराट० ७१ । १९-२१ )। उत्तरा को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करना ( विराट० ७२ । ७ ) । युद्ध न करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण को ही सहायकरूप में स्वीकार करना ( उद्योग० ७ । २१ ) । हस्तिनापुर को लौटते हुए संजय से कौरवों को संदेश देना (उद्योग० ३२ अध्याय के आदि में दाक्षिणात्य पाठ) । संजय द्वारा इनकी वीरता का वर्णन (उद्योग० ५० । २६-२८)। कौरवों से संधि के विषय में श्रीकृष्ण के समक्ष अपने विचार प्रकट करना ( उद्योग ० ७८ अ० में ) । आधा राज्य लेकर ही संधि स्वीकार करने के लिये श्रीकृष्ण से कहना ( उद्योग० ८३ । ५१-५३ ) । इनके द्वारा धृष्टद्युम्न को प्रधान सेनापति बनाने का प्रस्ताव ( उद्योग० १५१ । १९-२५ ) । युद्ध के लिये कही गयी श्रीकृष्ण की बातों का समर्थन ( उद्योग० १५४ । २५-२६ ) । अपने पराक्रम का वर्णन करके रुक्मी की सहायता को अस्वीकार करना ( उद्योग० १५८ । २७ - ३५ ) । उलूक से दुर्योधन के संदेश का उत्तर ( उद्योग० १६२ । ३७-४४ ) । उलूक से दुर्योधन के संदेश का उत्तर ( उद्योग० १६३ । ३-२३)। युधिष्ठिर के पूछने पर त्रिलोकी को पलक मारते नष्ट करने की अपनी शक्ति बताना ( उद्योग० १९४ । १०-११ )। युधिष्ठिर की आज्ञा से इनके द्वारा अपनी सेना का वज्रव्यूह- निर्माण ( भीष्म० १९ । ७ ) । 'श्रीकृष्ण की कृपा से विजय होती है' ऐसा कहकर युधिष्ठिर को आश्वासन ( भीष्म० २० । ७१७ ) । इनके द्वारा दुर्गादेवी का स्तवन और वरप्राप्ति ( भीष्म० २३ । ४-१९ )। इनका श्रीकृष्ण से दोनों सेनाओं के बीच में रथ खड़ा करने के लिये कहना ( भीष्म० २५ । २१ ) । स्वजनों को देखकर मोहग्रस्त हो युद्ध से खेद, धर्म-नाश का भय और दोष प्रकट करते हुए धनुष त्यागकर बैठ जाना ( भीष्म० २५ । २६-४७ ) । किंकर्तव्यविमूढ़ होकर श्रीकृष्ण से अपने कर्तव्य के विषय में शिक्षा देनेके लिये प्रार्थना करते हुए युद्ध न करने का निश्चय करके बैठ जाना (भीष्म० २६ । ४-९ ) । अर्जुन का भगवान् से गीता के उपदेश सुनना ( भीष्म० २६ । ११ से ४२ अ० तक ) । अर्जुन का भगवान् से स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण पूछना ( भीष्म० २६ । ५४ ) । ज्ञान और कर्म की श्रेष्ठता के विषय में अर्जुन की शङ्का ( भीष्म० २७ । १-२ )। बलात्कार से पाप कराने में हेतु क्या है, इस विषय में इनका प्रश्न ( भीष्म० २७ । ३६ ) । भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म आधुनिक मानकर अर्जुन का संदेह करना ( भीष्म० २८ । ४ ) । संन्यास और निष्काम कर्मयोग की श्रेष्ठता के विषय में प्रश्न ( भीष्म० २९ । १ ) । योगभ्रष्ट पुरुष की गति के सम्बन्ध में अर्जुन का प्रश्न और संशय-निवारण के लिये भगवान् से प्रार्थना ( भीष्म० ३० । ३७-३९ ) । ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में इनके सात प्रश्न ( भीष्म० ३२ । १-२ ) । अर्जुन द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और उनके प्रभाव का वर्णन करते हुए उनकी विभूतियों को जानने की इच्छा प्रकट करना तथा भगवच्चिन्तन के विषय में सात प्रश्न करके योगशक्ति और विभूतियों को विस्तार से कहने के लिये प्रार्थना करना ( भीष्म० ३४ । १२-१८ ) । अपने मोह की निवृत्ति मानते हुए अर्जुन द्वारा भगवदवचनों की प्रशंसा एवं विश्वरूप देखने की इच्छा प्रकट करके उस रूप का दर्शन कराने के लिये भगवान् से प्रार्थना ( भीष्म० ३५ । १-४ ) । अर्जुन का भगवान् के विश्वरूप का दर्शन और स्तुति करना ( भीष्म० ३५। १५३१ )। भयभीत अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति और चतुर्भुजरूप का दर्शन कराने के लिये प्रार्थना ( ३५ । ३५-४६ ) । साकार-निराकार के उपासकों में कौन श्रेष्ठ है, यह जानने के लिये अर्जुन का प्रश्न (भीष्म० ३६ । १ ) । गुणातीत पुरुष के विषय में अर्जुन के तीन प्रश्न ( भीष्म० ३८ । २१ ) । शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्धा से पूजन करने वाले पुरुषों की निष्ठा के विषय में इनका प्रश्न ( भीष्म० ४१ । १ ) । संन्यास और त्याग का तत्त्व जानने के लिये अर्जुन का प्रश्न (भीष्म० ४२ । १) । अर्जुन और श्रीकृष्ण के प्रभाव का कथन (भीष्म० ४२ । ७८) । कवच उतारकर पैदल ही कौरवसेना की ओर जाते हुए युधिष्ठिर से उधर जाने का कारण पूछना (भीष्म० ४३ । १६) । प्रथम दिन के युद्ध में इनका भीष्म के साथ द्वन्द्वयुद्ध (भीष्म० ४५। ८-११) । भीष्म के साथ घोर युद्ध (भीष्म० ५२ अ० में) । दूसरे दिन के युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए कौरवसेना को खदेड़ देना (भीष्म० ५५ । १७- ३५) । भीष्म को मारने के लिये उद्यत हुए श्रीकृष्ण को रोककर उनसे कर्तव्य-पालन के लिये प्रतिज्ञा करना ( भीष्म ० ५९ । १०१-१०३) । इनके द्वारा कौरवसेना की पराजय और तीसरे दिन के युद्ध की समाप्ति (भीष्म० ५९ । १११-१३२) । भीष्म के साथ द्वैरथ युद्ध (भीष्म० ६०।२५ - २९) । भीष्म के सा घमासान युद्ध ( भीष्म० ७१ अ० में ) । अश्वत्थामा के साथ युद्ध (भीष्म० ७३ । ३-१६) । इनके द्वारा त्रिगर्तराज सुशर्मा की पराजय और कौरवसेना में भगदड़ ( भीष्म० ८२ । १ ) । इनका अद्भुत पराक्रम (भीष्म० ८५ । १-८ ) । इनके द्वारा रथसेना का संहार (भीष्म० ८९ । ३५-३८) । इरावान् के वध से इनके दुःखपूर्ण उद्गार (भीष्म० ९६ । २ - १२) | दुर्योधन के प्रति भीष्म द्वारा इनके पराक्रम का वर्णन (भीष्म० ९८ । ४- १५) । द्रोणाचार्य और सुशर्मा के साथ युद्ध (भीष्म० १०२ । ६-२३) । इनके द्वारा त्रिगर्तों की पराजय (भीष्म० १०४ । ४- ८ ) । श्रीकृष्ण के चेतावनी देने पर भीष्म के साथ युद्ध (भीष्म० १०६ । ४२ - ५४ ) । भीष्म को मारने के लिये उद्यत श्रीकृष्ण से कर्तव्यपालन के लिये प्रतिज्ञा करना (भीष्म० १०६ । ७०७५)। भीष्मवध के लिये उद्यत न होना (भीष्म० १०७ । ९१-९५ के बाद तक ) । श्रीकृष्ण के समझाने पर भीष्म वध के लिये उद्यत होना (भीष्म० १०७।१०३ - १०६) । भीष्म- वध के लिये शिखण्डी को प्रोत्साहन देना (भीष्म० १०८ । ५२- ६० ) । इनके भय से पीड़ित होकर कौरवसेना का पलायन (भीष्म० १०९।१३-१४) । दुःशासनके साथ इनका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११० । २८-४६; १११ । ५७-५८ ) । इनका अद्भुत पुरुषार्थ ( भीष्म० ११४ अ० में ) । भगदत्त के साथ अर्जुन का द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११६ । ५६-६०)। भीष्म के साथ द्वन्द्वयुद्ध (भीष्म० ११६ । ६२-७८ ) । भीष्म के साथ घोर युद्ध और उन्हें मूर्छित करना (भीष्म० ११७ । ३५- ६४ ) । दुःशासन के साथ युद्ध (भीष्म० ११७ । १२-१९)। शिखण्डी को आगे करके भीष्म पर आक्रमण (भीष्म० ११८ । ३७-५४) । भीष्म को रथ से गिराना (भीष्म० ११९ । ८७) । बाणशय्या पर सोये हुए भीष्म को तीन बाण मारकर तकिया देना (भीष्म० १२० । ४५) । दिव्यास्त्र द्वारा भीष्म के मुख में शीतल जल की धारा गिराना ( भीष्म० १२१ । २४-२५ ) । धृतराष्ट्र द्वारा इनकी वीरता का वर्णन ( द्रोण० १० । १५- २८) । नरस्वरूप में इनकी महिमा का वर्णन - पूर्वदेवौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ।। एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि। (द्रोण० ११ । ४१- ४२ ) । द्रोणाचार्य द्वारा पकड़े जाने के भय से भीत युधिष्ठिर को आश्वासन (द्रोण० १३ । ७-१४) । द्रोणाचार्य के साथ युद्ध और उनकी सेना को पराजित करना (द्रोण० १६ । ४३- ५१ ) । युधिष्ठिर की रक्षा का भार सत्यजित् को सौंपना (द्रोण० १७ । ४४) । संशप्तकों के साथ युद्ध और सुधन्वा का वध ( द्रोण० १८ । २२ तथा १९ अ० में ) । इनके द्वारा संशप्तकों का वध ( द्रोण० २७ । १८-२६ ) । सुशर्मा के भाई का वध और सुशर्मा की पराजय (द्रोण० २८ । ८-१०)। भगदत्त के साथ युद्ध (द्रोण० २८ । १४-३० से २९ अ० तक ) । श्रीकृष्ण से वैष्णवास्त्र का रहस्य पूछना (द्रोण० २९ । २१-२४ ) । इनके द्वारा भगदत्त के हाथी सुप्रतीक का वध (द्रोण० २९ । ४३)। अर्जुन के द्वारा भगदत्त का वध (द्रोण० २९ । ४७५०) । वृषक और अचल का वध (द्रोण० ३०।११ ) । इनका शकुनि की माया का नाश करते हुए परास्त करना (द्रोण० ३० । १५-२८ ) । कर्ण के साथ युद्ध (द्रोण० ३२ । ५२ - ६२) । इनके द्वारा कर्ण के तीन भाइयों का वध (द्रोण० ३२ । ६०-६१) । अभिमन्यु की मृत्यु पर विलाप ( द्रोण० ७२ । १९-६५ ) । भाइयों पर क्रोध प्रकट करना (द्रोण० ७२ । ७६-८३) । युधिष्ठिर के मुख से अभिमन्युवध का वृत्तान्त सुनकर मूर्छित होना (द्रोण० ७३ । १६-१७) । जयद्रथवध की प्रतिज्ञा करना (द्रोण० ७३ । २० - ४९ ) । श्रीकृष्ण से जयद्रथवध के विषय में वीरोचित वचन कहना ( द्रोण० ७६ अ० में) । श्रीकृष्ण से पुत्रवधू उत्तरासहित सुभद्रा को समझाने के लिये कहना (द्रोण० ७७ । ९-१० ) । इनके द्वारा शङ्करजी का निशीथ-पूजन (द्रोण० ७९ । १-४) । (अर्जुनका स्वप्न-) स्वप्न में श्रीकृष्ण का आना और उनकी सम्मति से उनके साथ शिवजी के पास जाकर प्रणाम करना (द्रोण० ८० । २-४९)। इनके द्वारा भगवान् शिव की स्तुति ( द्रोण० ८० । ५५- ६४)। भगवान् शिव से दिव्यास्त्र की याचना ( द्रोण० ८१।३), पाशुपतास्त्र की प्राप्ति और श्रीकृष्णसहित शिविर को लौटना (स्वप्न की समाप्ति) (द्रोण० ८१ । २१-२४) । पाण्डवसभा में अपना स्वप्न सुनाना (द्रोण० ८४ । ६) । श्रीकृष्ण और सात्यकि के साथ रणयात्रा (द्रोण० ८४ । २१) । सात्यकि को युधिष्ठिर की रक्षा का भार सौंपना (द्रोण० ८४ । २७-३४) । युद्ध के आरम्भ में इनके द्वारा शङ्खनाद ( द्रोण० ८८ । २०) । दुर्मर्षण की गजसेना का संहार (द्रोण० ८९ अ० में ) । इनका दुःशासन के साथ युद्ध और उसका पलायन ( द्रोण० ९० अ० में ) । इनके द्वारा द्रोणाचार्य का सम्मान ( द्रोण० ९१ । ३६) । द्रोणाचार्य के साथ युद्ध और उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना (द्रोण० ९१ । ११३२; ९२ । ६-१४)। कृतवर्मा के साथ युद्ध (द्रोण० ९२ । १६-२६)। श्रुतायुध के साथ युद्ध ( द्रोण० ९२ । ३५ -४३ ) । काम्बोजराज सुदक्षिण के साथ युद्ध और उसका वध (द्रोण० ९२ । ६१- ७१) । श्रुतायु और अच्युतायु के साथ इनका युद्ध और उन दोनों का वध (द्रोण० ९३ । ७ - २४ ) । इनके द्वारा नियुतायु और दीर्घायु का वध (द्रोण० ९३ । २९) । म्लेच्छसेना का संहार ( द्रोण० ९३ । ३१ - ५९ ) । श्रुतायु और अम्बष्ठ के साथ युद्ध और अम्बष्ठ का वध (द्रोण० ९३ । ६०- ६) । विन्द-अनुविन्द का वध (द्रोण० ९९ । २५-२९) । संग्रामक्षेत्र में इनका सरोवर प्रकट करना (द्रोण० ९९ । ५९) । रणक्षेत्र में बाणमय गृह का निर्माण (द्रोण० ९९ । ६२ ) । श्रीकृष्ण के प्रोत्साहन देने पर दुर्योधन को मारने के लिये उद्यत होना (द्रोण० १०२/१९-२१ के बाद दाक्षिणात्य पाठ )। दुर्योधन के साथ युद्ध और उसे परास्त करना (द्रोण० १०३ । २४-३२) । इनका कौरव महारथियों के साथ घोर युद्ध (द्रोण० १०४ अ० में ) । इनके ध्वज का वर्णन (द्रोण० १०५। ८-९) । इनका नौ महारथियों के साथ युद्ध (द्रोण० १०५ । ३३-३८)। कर्ण और अश्वत्थामा को खदेड़ना (द्रोण० १३९ । ११२१२१ ) । सात्यकि को देखकर अर्जुन की चिन्ता (द्रोण० १४१ । २६-३७) । श्रीकृष्ण की प्रेरणा से भूरिश्रवा की दाहिनी भुजा काटना (द्रोण० १४२ । ७२) । भूरिश्रवा को उत्तर देना (द्रोण० १४३ । १६-३२)। इनका सात कौरव महारथियों के साथ युद्ध (द्रोण० १४५ अ० में) । इनके द्वारा कर्ण की पराजय(द्रोण० १४५ । ८३)। कौरवसेना का भीषण संहार ( द्रोण १४६ अ० में ) । इनके द्वारा जयद्रथ का सिर काटकर उसे बाण द्वारा उसके पिता वृद्धक्षत्र की गोद में डालना (द्रोण० १४६ । १२२१२७ ) । कृपाचार्य और अश्वत्थामा को युद्ध में पराजित करना (द्रोण० १४७९- ११ ) । कृपाचार्य के मूर्च्छित होने पर विलाप करना (द्रोण० १४७।१३ - २७) । भीमसेन को कटुवचन सुनाने के कारण कर्ण को फटकारना (द्रोण० १४८ । ८-२२) । कर्णपुत्र वृषसेन के वध की प्रतिज्ञा करना (द्रोण० १४८ । १९-२०) । कर्ण के साथ युद्ध करके उसे पराजित करना (द्रोण० १५९।६२- ६४ ) । द्रोणाचार्य के साथ युद्ध और कौरवसेना को खदेड़ना (द्रोण० १६१ अ० में) । इनके द्वारा राक्षसराज अलम्बुष की परजय(द्रोण० १६७ । ४७) । शकुनि और उलूक की पराजय (द्रोण० १७१ । ३८-४०) । कर्ण के पराक्रम से भयभीत हुए युधिष्ठिर से प्रेरित हो इनका श्रीकृष्ण से अपना कर्तव्य पूछना (द्रोण० १७३ । २९-३४)। घटोत्कच को कर्ण के साथ युद्ध करने के लिये आदेश देना (द्रोण० १७३ । ६०-६२) । घटोत्कचवध से प्रसन्न हुए श्रीकृष्ण से उनकी प्रसन्नता का कारण पूछना (द्रोण० १८० । ६-१० ) । जरासंध आदि के वध के विषय में श्रीकृष्ण से प्रश्न करना (द्रोण० १८१ । १ ) । उभयपक्ष के सैनिकों को सो जाने के लिये आदेश देना (द्रोण० १८४ । २६२८) । द्रोणाचार्य के साथ घोर युद्ध करना(द्रोण० १८८। २४-५३)। श्रीकृष्ण से सात्यकि की प्रशंसा करना (द्रोण० १९१ । ४८-५३) । अश्वत्थामा के क्रोध और गुरुहत्या के भीषण परिणाम का वर्णन करना (द्रोण० १९६ । २६-५३)। नारायणास्त्र, गौ और ब्राह्मण के सामने गाण्डीव रख देने की बात कहना (द्रोण० १९९ । ५३ ) । व्यासजी से अपने आगे-आगे चलनेवाले त्रिशूलधारी पुरुष के विषय में प्रश्न करना (द्रोण० २०२ । ४-८) । युधिष्ठिर के आदेश से अर्धचन्द्रव्यूह बनाकर कर्ण के साथ युद्ध करने के लिये प्रस्थान ( कर्ण० ११ । २८ ) । अश्वत्थामा के साथ घोर युद्ध और उसे परास्त करना (कर्ण० १६ अ० से १७ वें अ० तक)। इनके द्वारा हाथीसहित दण्डधार का वध ( कर्ण० १८ । १३) । इनके द्वारा हाथीसहित दण्ड का वध (कर्ण० १८ । -१९) । संशप्तकों का भीषण संहार (कर्ण० १९ । २-२६)। सुशर्मा के छः भाइयों ( सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, श्रुतंजय, सौश्रुति और मित्रवर्मा) का वध (कर्ण० २७ । १२- २५ ) । कौरव सेना का संहार ( कर्ण० ३० । १५-३६) । युधिष्ठिर के आदेश से कर्ण पर आक्रमण ( कर्ण० ४६ । ३७ )। इनके द्वारा संशप्तकों का संहार ( कर्ण० ४७ अ० में ) । सुशर्मा के साथ युद्ध और दस हजार संशप्तकों का वध ( कर्ण० ५३ अ० में ) । संशप्तकों का संहार और सुदक्षिण के भाई का वध (कर्ण० ५६ । १०० - ११७) । अश्वत्थामा के साथ युद्ध और उसे परास्त करना (कर्ण० ५६ । १२१-१४२)। श्रीकृष्ण से युधिष्ठिर को देखने के लिये उनके पास चलने का आग्रह ( कर्ण० ५८ । ३-७ ) । धृष्टद्युम्न को अश्वत्थामा के चंगुल से छुड़ाना और अश्वत्थामा को पराजित करना ( कर्ण० ५९ । ५४-६१ ) । इनके द्वारा अश्वत्थामा की पराजय ( कर्ण० ६४ । ३१-३२ ) । श्रीकृष्ण के साथ युधिष्ठिर के पास जाकर उनके चरणों में प्रणाम करना ( कर्ण० ६५ । १७ ) । अब तक कर्ण के न मारे जाने का कारण युधिष्ठिर से बतलाते हुए उसके वध की प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ६७ अ० में ) । युधिष्ठिर का वध करने को उद्यत होना ( कर्ण ० ६९ । ९-१५ ) । श्रीकृष्ण से अपनी प्रतिज्ञा-पूर्ति का उपाय पूछना ( कर्ण० ६९ । ६७- ७५ ) । 'तू' शब्द कहकर युधिष्ठिर को कटुवचन सुनाना ( कर्ण० ७० । २-२१ ) । युधिष्ठिर का अपमान करने के कारण आत्महत्या के लिये तलवार खींचना ( कर्ण० ७०।२३)। युधिष्ठिर से क्षमायाचना (कर्ण० ७०। ३८-३९ ) । युधिष्ठिर से कर्ण-वध की प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ७० । ४०-४१ ) । युधिष्ठिर के चरणों में प्रणिपात और कर्ण- वध की प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ७१ । ३५-३८ ) । कर्ण-वध के लिये मार्ग में जाते समय चिन्तामग्न होना ( कर्ण० ७२ । १६-१७ ) । श्रीकृष्ण से इनके वीरोचित उद्गार ( कर्ण० ७४ अ० में ) । इनके द्वारा कौरवसेना का भीषण संहार ( कर्ण० ७७ । ५-२० ) । श्रीकृष्ण से कर्ण के पास चलने के लिये कहना ( कर्ण० ७९ । ७१२ ) । इनके द्वारा कौरवसेना का विध्वंस ( कर्ण० ७९ । ७१९० से ८० अ० तक,  ८१। ५-२० ) कौरवों को ललकारते हुए वृषसेन का वध ( कर्ण० ८५ । ३७ ) । युद्ध के लिये इनका कर्ण के सम्मुख उपस्थित होना ( कर्ण०   ८६ । २३ ) । कर्णवध के लिये श्रीकृष्ण से वार्तालाप ( कर्ण० ८७ । १०५-११७ ) । कर्ण के साथ इनका द्वैरथ युद्ध ( कर्ण० ८९ अ० से ९० अ० तक ) । इनके द्वारा राजकुमार सभापति का वध ( कर्ण० ८९ । ६४ )। कर्ण के सर्पमुख बाण से इनके किरीट का गिरना ( कर्ण० ९०। ३३) । इनके द्वारा कर्ण का वध (कर्ण० ९१ । ५० ) । रथसेना का विध्वंस ( कर्ण० ९३ । ४२-४६ )। अश्वत्थामा के साथ युद्ध ( शल्य० १४ अ० में ) । श्रीकृष्ण के समक्ष दुर्योधन के दुराग्रह की निन्दा ( शल्य० २४ । १६५० ) । कौरवों की रथसेना का संहार (शल्य० २५ । १-१४ ) । दुर्योधन को मारने के विषय में श्रीकृष्ण से वार्तालाप ( शल्य० २७ । १३२७ ) । सत्यकर्मा, सत्येषु और पैंतालीस पुत्रोंसहित सुशर्मा का वध ( शल्य० २७ । ३८४८ ) । श्रीकृष्ण से भीमसेन और दुर्योधन के बलाबल के विषयमें पूछना ( शल्य० ५८ । २ ) । । भीमसेन को अपनी जाँघ ठोंककर संकेत करना (शल्य० ५८ । २१ ) । युद्ध के पश्चात् इनके रथ का दग्ध होना ( शल्य० ६२ । १३ ) । श्रीकृष्ण से अपने रथ के दग्ध होने का कारण पूछना ( शल्य० ६२ । १६-१७) । अश्वत्थामा से भीमसेन की रक्षा के लिये श्रीकृष्ण के साथ जाना ( सौप्तिक० १३ । ६ ) । अश्वत्थामा का अस्त्र शान्त करने के लिये ब्रह्मास्त्र का प्रयोग ( शल्य० १४ । ५-६ ) । व्यासजी को देखकर अपना अस्त्र लौटा लेना ( सौप्तिक० १५। २-४ ) गान्धारी के शाप के भय से श्रीकृष्ण के पीछे छिपना ( स्त्री० १५ । ३१ ) । धन की महत्ता दिखाते हुए राजधर्म-पालन के लिये युधिष्ठिर को समझाना ( शान्ति० ८ अ० में ) युधिष्ठिर को समझाते हुए गृहस्थधर्म के पालन पर जोर देना ( शान्ति० ११ अ० में ) । युधिष्ठिर से इनके द्वारा राधर्म की महत्ता का वर्णन करना ( शान्ति० १५ अ० में ) । राजा जनक और उनकी रानी का दृष्टान्त देकर युधिष्ठिर को संन्यास लेने से रोकना ( शान्ति० १८ अ० में ) । युधिष्ठिर से क्षत्रिय धर्म की प्रशंसा करना ( शान्ति० २२ अ० में ) । युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिये श्रीकृष्ण से प्रार्थना करना (शान्ति० २९ । २-३ )। अर्जुन को युधिष्ठिर का शत्रुओं तथा दुष्टों के दमन का कार्य सौंपना ( शान्ति० ४१ । १३ ) । युधिष्ठिर का इन्हें रहने के लिए दुःशासन का भवन देना ( शान्ति० ४४ । ८-९ )। युधिष्ठिर के पूछने पर त्रिवर्ग में अर्थ की प्रधानता बताना ( शान्ति० १६७ । ११-२० ) । श्रीकृष्ण से उनके नामों की व्युत्पत्ति पूछना ( शान्ति० ३४१ | ५-७ ) । श्रीकृष्ण से पुनः गीता का ज्ञान पूछना ( आश्व० १६ । ५७ )। श्रीकृष्ण से परब्रह्म के स्वरूप के विषय में प्रश्न (आश्व० ३५ । १ ) । श्रीकृष्ण के प्रति इनके प्रशंसासूचक वचन ( आश्व० ५२ । ६२४ ) । श्रीकृष्ण की द्वारका-यात्रा के लिये युधिष्ठिर से आज्ञा माँगना ( आश्व० ५२ । ४२-४३ )। व्यासजी के समझाने से पुत्रशोक से निवृत्त होकर संतोष-लाभ करना ( आश्व० ६२ । १८ ) । धन लाने के विषय में पाँचों भाइयों में बातचीत और भाइयों के साथ जाकर इनका हिमालय से मरुत्त का धन ले आना ( आश्व० ६३ अ० से ६५ तक ) । अर्जुन की अश्वरक्षा के लिये नियुक्ति ( आश्व० ७२ । १६ )। सेनासहित अर्जुन का अश्व की रक्षा के लिये उसके पीछे-पीछे पैदल ही जाना (आश्व० ७३ । ७-८ ) । अर्जुन के द्वारा त्रिगर्तों की पराजय, सूर्यवर्मा की हार, केतुवर्मा का वध, धृतवर्मा का घायल होना आदि ( आश्व० ७४ अ० में ) । प्राग्ज्यौतिषपुर में भगदत्त के पुत्र वज्रदत्त की पराजय तथा उसके हाथी का विनाश (आश्व० ७६ । १७-१९ ) । अर्जुन का सैन्धवों के साथ युद्ध और दुःशला के अनुरोध से उसकी समाप्ति (आश्व० ७७-७८ अ० ) । अर्जुन और बभ्रुवाहन का युद्ध तथा अर्जुन की मृत्यु (आश्व० ७९ अ० में) । उलूपी के प्रयत्न से संजीवनी मणि के द्वारा अर्जुन का पुनर्जीवन (आश्व० ८० अ० में ) । उलूपी से उसके और चित्राङ्गदा के युद्धस्थल में आने का कारण पूछना (आश्व० ८१ । १ में) । अर्जुन की पराजय का रहस्य तथा उलूपी और चित्राङ्गदा से विदा लेकर उनका पुनः अश्व के पीछे जाना (आश्व० ८१ अ० में) । अर्जुन द्वारा मगधराज मेसंधि की पराजय (आश्व० ८२ अ० में) । शकुनि- पुत्र की पराजय, शकुनि की स्त्री के अनुरोध से अर्जुन का युद्ध बंद कर देना (आश्व० ८४ अ० में ) । श्रीकृष्ण का युधिष्ठिर से अर्जुन का संदेश कहना ( आश्व० ८६ । ९ - २१ ) । अर्जुन के विषय में श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर की बातचीत, अर्जुन के दूत तथा अर्जुन का हस्तिनापुर में आना (आश्व० ८७ । १-२२) । धृतराष्ट्र के श्राद्ध और दान के लिये धन माँगने पर अर्जुन की सहमति तथा भीमसेन के अस्वीकार करने पर अर्जुन का उन्हें समझाना ( आश्रम ० ११-१२ अ० ) । यादवोंसहित इनका वन में जाकर धृतराष्ट्र और माता कुन्ती आदि के दर्शन करना तथा व्यासजी के द्वारा मृत व्यक्तियों का आवाहन होने पर उन सबसे मिलना, हस्तिनापुर को लौटना तथा धृतराष्ट्र आदि के दग्ध होने के समाचार से दुखी होना और उनके श्राद्ध आदि करना ( आश्रम० २३-३९ अ० तक)। अर्जुन का दारुक के साथ द्वारका जाना, कृष्णापत्नियों से मिलना और उन्हें धीरज बँधाकर वसुदेव के पास जाना ( मौसल० ५ अ० में ) । अर्जुन से मिलकर वसुदेव का विलाप करना और उनके लिए हे गये श्रीकृष्ण का संदेश सुनाना ( मौसल० ६ अ० में)। 'अब पाण्डवों के भी परलोकगमन का समय आ गया है, हम यहाँ के लोगों को इन्द्रप्रस्थ ले जाएँगे - ऐसा वसुदेव से कहकर अर्जुन का दारुक तथा मन्त्रियो को यात्रा की तैयारी के लिये आदेश देना तथा रात में श्रीकृष्णभवन में ठहरना (मौसल० ७ । १-१४ )। वसुदेव का परलोकवास और अर्जुन द्वारा उनका दाह-संस्कार एवं वृष्णिवंशी कुमारों द्वारा जलदान (मौसल० ७ । १५-५७)। अर्जुनका यादव-विनाशस्थल में जाकर छोटे-बड़े के क्रम से सबका दाह करना, फिर श्रीकृष्ण-बलराम के शरीरों का अनुसंधान कराकर उनका भी दाह-संस्कार करना ( मौसल० ७ । २८-३१ ) । अर्जुन का श्रीकृष्णपत्नियों तथा द्वारकावासियों को लेकर इन्द्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान (मौसल० ७ । ३२)। मार्ग में लुटेरों का आक्रमण और अर्जुन आदि का उनसे स्त्रियों की रक्षा करने में असमर्थ होना । शेष व्यक्तियों को लेकर जाना । मार्तिकावत में कृतवर्मा के पुत्र को सरस्वती के तट पर सात्यकि के पुत्र को उन प्रदेशों का राजा बनाना और वज्र को इन्द्रप्रस्थ में अभिषिक्त करना (मौसल० ७ । ५१-७२ ) । अर्जुन का व्यासजी से बीती बातें बताना और व्यासजी का उन्हें आश्वासन देते हुए पाण्डवों को महाप्रस्थानके लिये प्रेरित करना ( मौसल० ८ अ० में) अर्जुन का भाइयों सहित महाप्रस्थान और मार्ग में अग्निदेव और भाइयों के कहने से गाण्डीव धनुष को जल में डाल देना ( महाप्रा० १ । १-४२ ) । मार्ग में अर्जुन का गिरना और युधिष्ठिर का उनके गिरने का कारण बताना ( महाप्रा० २ । १८-२२ ) । अर्जुन का भगवान् श्रीकृष्ण के पार्षदरूप से दर्शन ( स्वर्गा० ४ । ४ )।

महाभारतमें आये हुए अर्जुन के नाम ऐन्द्रि, भारत, भीमानुज, भीमसेनानुज, बीभत्सु, बृहन्नला, शाखामृगध्वज, शक्रज, शक्रनन्दन, शक्रसूनु, शक्रात्मज, शक्रसुत, श्वेताश्व, श्वेतहय, श्वेतवाह, श्वेतवाहन, देवेन्द्रतनय, धनंजय, गाण्डीवभृत्, गाण्डीवधन्वा, गाण्डीवधारी, गाण्डीवी, गुडाकेश, इन्द्ररूप, इन्द्रसुत, इन्द्रात्मज, इन्द्रावरज, जय, जिष्णु, कपिध्वज, कपिकेतन, कपिप्रवर, कपिवरध्वज, कौन्तेय, कौरव, कौरवश्रेष्ठ, कौरव्य, कौरवेय, किरीटभृत्, किरीटमाली, किरीटवान्, किरीटी, कृष्ण, कृष्णसारथि, कुन्तीपुत्र, महेन्द्रसूनु, महेन्द्रात्मज, नर, पाकशासनि,पाण्डव, पाण्डवेय, पाण्डुनन्दन, पार्थ, पौरव, फाल्गुन, प्रभञ्जनसुतानुज, सव्यसाची, सुरसूनु, तापत्य, त्रिदशे- श्वरात्मज, वानरध्वज, वानरकेतन, वानरकेतु, वानरवर्यकेतन, वासवज, वासवनन्दन, वासवात्मज, वासवि, विजय आदि ।

अर्जुनकी पत्नियोंके नाम द्रौपदी, उलूपी, चित्राङ्गदा और सुभद्रा ।

इनके पुत्रोंके नाम क्रमशः - श्रुतिकीर्ति, इरावान्, बभ्रुवाहन और अभिमन्यु ।

( २ ) हैहयराज कार्तवीर्य, यमसभाके एक सदस्य (सभा० ८। ११)। ( विशेष देखिये कार्तवीर्य ) (३) यमसभा में बैठनेवाले एक राजा ( सभा० ८ । १७ ) ।

अर्जुनक - एक व्याध; इसका गौतमी, सर्प, मृत्यु और काल के साथ संवाद ( अनु० १ । २१-६८ )।

अर्जुनवनवासपर्व- आदिपर्व का अवान्तर पर्व अध्याय २१२ से २१७ तक ।

अर्जुनाभिगमनपर्व- वनपर्व का अवान्तर पर्व, अध्याय १२ से ३७ तक । 

Remarks on Arjuna

अर्णव वायु १०१.१३/२.३९.१३( पृथिवी, अन्तरिक्ष, दिव व मह की ४ अर्णव संज्ञा का उल्लेख )

 

अर्थ अग्नि ३४४( अर्थालङ्कार का निरूपण ), गरुड १.२०५.८३/१.२१३.८३( अर्थ का महत्त्व व अर्थ योग्य द्रव्य ), ३.२२.२५(अर्थ के २४ लक्षणों से युक्त होने का उल्लेख), ब्रह्माण्ड ३.४.३६.७१( चन्द्रमा की १६ कलाओं के अन्तर्गत अर्थ आकर्षणिका कला ), भविष्य ३.४.१५.५४( शब्दमात्र समूहों के स्वामी राम, अर्थ मात्र समूहों के स्वामी क्लीब लक्ष्मण ), भागवत ४.१.५१( धर्म व बुद्धि - पुत्र ), ६.६.७( अर्थसिद्धि : साध्यगण - पुत्र ), ११.२२.१६( अर्थ की जातियां : शब्द, स्पर्श, रस, रूप, गन्ध ), ११.२३.१९( स्तेय, हिंसा आदि १५ अनर्थों के अर्थमूल होने का उल्लेख ), मत्स्य ७.६३( इन्द्र द्वारा अर्थशास्त्र का आश्रय लेकर दिति के गर्भ का छेदन ), २४.२( बुध : सर्व अर्थशास्त्र के ज्ञाता ), २२०.११( अर्थ सम्बन्धी दोषों का वर्णन ), वराह १७.७३( इन्द्रिय - अर्थों का पितरगण बनना ), वायु ६१.७८( अर्थशास्त्र : १८ विद्याओं में से एक ), विष्णु १.८.१८( वाणी - पति ), विष्णुधर्मोत्तर ३.५०.१२( इन्द्र के ऐरावण/ऐरावत का अर्थ रूप में निरूपण ), ३.५२.१५( रति के हाथ में शंख के अर्थ का प्रतीक होने का उल्लेख ), शिव ७.२.११.४६( ज्ञान, ज्ञेय, अनुष्ठेय आदि ६ अर्थों के संग्रह का संग्रह नाम ), स्कन्द १.२.४.५७( अर्थ दान का निरूपण ), ६.३२.४०( हेमपूर्ण उदुम्बर प्राप्ति के प्रसंग में कश्यप ऋषि द्वारा अर्थ परिग्रह की निन्दा ), महाभारत वन ३१३.७७( काम के त्याग से अर्थवान् होने का उल्लेख : यक्ष - युधिष्ठिर संवाद ), ३१३.१०१( धर्म, अर्थ, काम का परस्पर विरोध होते हुए भी सङ्गम का कथन ), शान्ति १७०.१२( चार प्रकार की अर्थगतियों के नाम मित्र, विद्या, हिरण्य, बुद्धि ), योगवासिष्ठ ६.२.४३.३७( मन की अर्थ से एकरूपता का वर्णन ), लक्ष्मीनारायण १.५३३.७१( शब्दादि इन्द्रियार्थों के पितर रूप होने का उल्लेख ), १.५३३.१२४( इन्द्रियार्थों के दिव्य रूप में पितर बनने का उल्लेख ), २.१८१.१९( अर्थ की नगरी में अर्थेष्ट राक्षस द्वारा श्रीहरि की परीक्षा, हरि द्वारा उद्धार पर राक्षस का तुषित देव बनना ), ४.१०१.१०४( अर्थवेदन : कृष्ण व हरिणी - पुत्र ), कथासरित् ७.९.६८( अर्थलोभ : वैश्य, मानपारा - पति, अर्थ के लोभ में पत्नी का रात्रि में विक्रय करने के कारण पत्नी द्वारा त्याग की कथा ), ९.४.१६३( अर्थश्री व भोगश्री में चुनाव का प्रश्न : यशोवर्मा द्वारा परीक्षा - उपरान्त भोगश्री का वरण ), १०.१.८९( अर्थदत्त : ईश्वरदत्त का मित्र, ईश्वरदत्त की वेश्या के मिथ्या प्रेम जाल से रक्षा करने की कथा ), १२.२८.५( अर्थदत्त : वैश्य, अनङ्गमञ्जरी कन्या का पिता ), द्र. धर्म - अर्थ - काम - मोक्ष, परमार्थ, श्रुतार्थ Artha

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अर्धनारीश्वर नारद १.६६.११४( अर्धनारीश की शक्ति वारुणी का उल्लेख ), १.९१.१६०( अर्धनारीश्वर शिव मन्त्र विधान ), ब्रह्माण्ड ३.४.४४.५२( लिपिन्यास प्रसंग में एक वर्ण के देवता ), मत्स्य ६०.२५( अर्धनारीश्वर शिव की शक्ति असिताङ्गी ), १९२.२८( शुक्ल तीर्थ में अर्धनारीश्वर शिव की आराधना ), २६०.१( अर्धनारीश्वर शिव के स्वरूप का वर्णन ), वामन ९०.१०( चक्र तीर्थ में विष्णु का अर्धनारीश्वर नाम से वास ), शिव ३.३( अर्धनारीश्वर की शिव से उत्पत्ति ), ७.१.१५( अर्धनारीश्वर का प्रादुर्भाव, मैथुनी सृष्टि ), लक्ष्मीनारायण २.३५.७(, २.३५.९९( कृष्ण द्वारा अर्धनारीश्वर नट के गर्व का खण्डन, केसरी द्वारा अर्धनारीश्वर के शिर का भक्षण, पुन: सञ्जीवन ), ३.२१.१४( आर्ष वत्सर में श्रीहरि के अर्धनारी तनु रूप में प्राकट्य का वर्णन ) Ardhanaareeshwara/ ardhanarishwara

 

अर्बुद पद्म ३.२४.४( अर्बुद का संक्षिप्त माहात्म्य ), ब्रह्माण्ड १.२.१६.६२( अपरान्त का एक देश ), वामन ९०.१९( अर्बुद में विष्णु का त्रिसौपर्ण नाम से वास ), स्कन्द ७.३.१+ ( अर्बुद पर्वत का माहात्म्य ), ७.३.३( हिमवान् - पुत्र, नन्दिवर्धन का मित्र, नन्दिवर्धन सहित उत्तङ्क निर्मित गर्त का पूरण ), ७.३.३६( अर्बुद की शोभा का वर्णन ), लक्ष्मीनारायण १.५५१+ ( अर्बुदाचल व अन्तर्वर्ती तीर्थों के माहात्म्य का वर्णन ), ४.८०.१६( नागविक्रम के सर्वमेध यज्ञ में अर्बुदी विप्रों के जापक होने का उल्लेख ) Arbuda

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अर्यमा अग्नि ९३.२९( वास्तुमण्डल में देवता, बलि का स्वरूप कथन - अर्य्यम्णे दक्षिणाशायां पूपान् कृसरया युतान्। ), गरुड ३.२४.८६(अर्यमाओं के अधिपति नैर्ऋत का उल्लेख - पीठस्य पूर्वे प्रणमेन्नैरृतिं च अर्याम्णानामधिपं चात्र देवि ॥), देवीभागवत ८.१०( हिरण्मय वर्ष में अर्यमा द्वारा विष्णु के कच्छप रूप की आराधना - ॐ नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणाय नोपलक्षितस्थानाय . ), ब्रह्माण्ड १.२.२४.४०( अर्यमा सूर्य का दश सहस्र रश्मियों द्वारा तापन - अर्यमा दशभिर्याति पर्जन्यो नवभिस्तपेत् ।। ), भविष्य ३.४.७.५७( विप्र, पितृमती - पति, धन प्राप्ति हेतु सूर्य की उपासना, सूर्य लोक प्राप्ति ), ३.४.१४.३१( अर्यमा पितर द्वारा स्वकन्या मेना को हिमवान् को प्रदान करना - अर्यमा तु तदा तुष्टो ददौ तस्मै सुता निजाम् । मेनां मनोहरां शुद्धां स दृष्ट्वा हर्षितोऽभवत् । । ), ३.४.१८.१७( संज्ञा के स्वयंवर में अर्यमा आदित्य का अघासुर से युद्ध - अघासुरोऽर्यमा चैव बलः शक्रस्तथैव च । ), भागवत १.१३.१५( शाप वश यमराज के विदुर शूद्र बनने पर अर्यमा द्वारा यमलोक का संचालन ), ४.१८.१८( पितरों द्वारा धेनु रूपी पृथ्वीदोहन में अर्यमा का वत्स बनना - वत्सेन पितरोऽर्यम्णा कव्यं क्षीरमधुक्षत । ), ५.१८.२९( अर्यमा द्वारा हिरण्मय वर्ष में कूर्म रूप की आराधना, आराधना - मन्त्र का कथन - यद्रूपमेतन्निजमाययार्पितमर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात्तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे), ६.६.३९( अदिति - पुत्र, द्वादश आदित्यों में से एक, मातृका - पति, चर्षणी - पिता - अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणयः सुताः।।), १२.११.३४( माधव/वैशाख मास के सूर्य का नाम - अर्यमा पुलहोऽथौजाः प्रहेतिः पुञ्जिकस्थली नारदः कच्छनीरश्च नयन्त्येते स्म माधवम् ), मत्स्य १२७.२( अर्यमा की शिशुमार चक्र की पश्चिम सक्थि में स्थिति ), २२५.१२( अदण्डी देव होने के कारण मनुष्यों द्वारा अर्यमा की अपूज्यता - पूज्यन्ते दण्डिनो देवैर्न पूज्यन्ते त्वदण्डिनः। न ब्रह्माणं विधातारं न पूषार्यमणावपि ।। ), शिव ५.१०.३९( अर्यमा  के लिए प्राची दिशा में बलि का विधान - पितृभ्यस्तु विनिक्षिप्य प्राच्यामर्यमणे ततः ।। धातुश्चैव विधातुश्च द्वारदेशे विनिःक्षिपेत् ।। ), स्कन्द ३.२.५.१०१(अर्यमा के त्रयी रूप होने का उल्लेख - रविर्हिरण्यरूपोऽसौ त्रयीरूपोऽयमर्यमा ।। ), ४.२.८९.४६( दक्ष यज्ञ में अर्यमा की बाहुओं का छेदन - अर्यम्णो बाहुयुगलं तथोत्पाटितवान्परः। ), लक्ष्मीनारायण २.१०७.३९( अर्यमा पितर व अर्यमा के अरुण नामक दूतों द्वारा कन्याओं की राक्षसों से रक्षा का उद्योग - अर्यम्णा सूर्यमन्त्रैश्चोत्पाद्यन्तेऽरुणकोटयः ।।), २.१०९.१८( अर्यमा द्वारा मकरकेतु राजा का वध ), २.१११.१६( अर्यमा पितर द्वारा बालकृष्ण को कन्याएं अर्पित करना, कृष्ण द्वारा अर्यमा के वास हेतु कारुकराद्रि/कश्मेरा पर्वत की भूमि देना - कश्मेरा पर्वतभूमिः कारुपर्वतशोभना ।। ), ४.२.९( राजा बदर के अर्यमा नामक विमान का कथन - द्वितीयं चार्यमसंज्ञं पितृलोकादिसञ्चरम् । ), ४.९४.१७( पितृ लोक के स्वामी, आर्या - पति, अर्यमा द्वारा कृष्ण का स्वागत - आरार्त्रिकं चकारापि पपौ पादजलामृतम् । ), कथासरित् ८.५.९६( अर्यमा का श्रुतशर्मा विद्याधर के सहयोगी उत्पात के रूप में अवतार -महौघारोहणोत्पातवेत्रवत्संज्ञकैः क्रमात् । त्वष्टुर्भगस्य चार्यम्णः पूष्णश्चाप्यात्मसंभवैः ।। ),  Aryamaa

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अर्वाचीन - पराचीन पद्म २.६२.४५( पिप्पल - सुकर्मा संवाद में अर्वाचीन - पराचीन का दर्शन )

 

अर्वावसु कूर्म १.४.३.७( सूर्य रश्मि, बृहस्पति ग्रह पोषक ), भविष्य १.८०.२९( अर्वावसु द्विज द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए सूर्य अर्चना, अरुण द्वारा सम्यक् फल प्राप्ति के लिए अर्वावसु को सप्तमी कल्प के विधान का कथन ), स्कन्द ३.१.३३( रैभ्य - पुत्र व परावसु - अनुज , परावसु के ब्रह्महत्या दोष की निवृत्ति के लिए तप ), Arvaavasu

 

अर्हत् भागवत ५.६.९( कर्णाटक देश में राजा, ऋषभ मुनि के परमहंस आचरण का अनुसरण करके पथभ्रष्ट होना )

 

अलकनन्दा गर्ग ७.२३.१२( अलकनन्दा की अलकापुरी के परित: स्थिति का उल्लेख ), वायु ४२.२७( अलकनन्दा गङ्गा का अवतरण ), स्कन्द ४.२.८८.६०( सती के रथ में ईषादण्ड का रूप ) Alakanandaa

 

अलका गर्ग ७.२३.१२( दिग्विजय के संदर्भ में प्रद्युम्न का अलकापुरी आगमन और यक्षों से युद्ध )भविष्य ३.४.१५.२४( शिव द्वारा विश्वकर्मा - निर्मित अलकापुरी कुबेर को प्रदान करने का उल्लेख ), भागवत ४.६.२३( कुबेर की पुरी, शोभा वर्णन ), वराह ८१.११( विशोक द्वादशी व्रत के संदर्भ में अलकों में माधव का न्यास ), विष्णुधर्मोत्तर ३.३१२.५( उष्ट्र या गर्दभ दान से अलका पुरी की प्राप्ति ), ३.३४१.८४( रक्त पताका युक्त ऋष्य दान से अलका पुरी की प्राप्ति ), स्कन्द ४.१.१३( द्यूतकर्म रत गुणनिधि विप्र का राजा दम व अगले जन्म में अलकाधिपति बनने की कथा ), ७.१.५६( धनदेश्वर लिङ्ग की पूजा से अलका अधिपतित्व की प्राप्ति ), हरिवंश २.६३( नरकासुर द्वारा सोलह हजार अप्सराओं को कैद करने का स्थान, अलकापुरी पर मुर का आधिपत्य ), कथासरित् ८.६.१८५( यक्षिणी द्वारा आदित्यशर्मा को अलकापुरी में लाना ), Alakaa

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अलक्तक लक्ष्मीनारायण २.२८३.५६( रमा व माणिकी द्वारा बालकृष्ण के करों व पदों में अलक्तक देने का उल्लेख )