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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Anapatya to aahlaada only)

by

Radha Gupta, Suman Agarwal, Vipin Kumar

Home Page

Anapatya - Antahpraak (Anamitra, Anaranya, Anala, Anasuuyaa, Anirudhdha, Anil, Anu, Anumati, Anuvinda, Anuhraada etc.)

Anta - Aparnaa ((Antariksha, Antardhaana, Antarvedi, Andhaka, Andhakaara, Anna, Annapoornaa, Anvaahaaryapachana, Aparaajitaa, Aparnaa  etc.)

Apashakuna - Abhaya  (Apashakuna, Apaana, apaamaarga, Apuupa, Apsaraa, Abhaya etc.)

Abhayaa - Amaavaasyaa (Abhayaa, Abhichaara, Abhijit, Abhimanyu, Abhimaana, Abhisheka, Amara, Amarakantaka, Amaavasu, Amaavaasyaa etc.)

Amita - Ambu (Amitaabha, Amitrajit, Amrita, Amritaa, Ambara, Ambareesha,  Ambashtha, Ambaa, Ambaalikaa, Ambikaa, Ambu etc.)

Ambha - Arishta ( Word like Ayana, Ayas/stone, Ayodhaya, Ayomukhi, Arajaa, Arani, Aranya/wild/jungle, Arishta etc.)

Arishta - Arghya  (Arishtanemi, Arishtaa, Aruna, Arunaachala, Arundhati, Arka, Argha, Arghya etc.)           

Arghya - Alakshmi  (Archanaa, Arjuna, Artha, Ardhanaareeshwar, Arbuda, Aryamaa, Alakaa, Alakshmi etc.)

Alakshmi - Avara (Alakshmi, Alamkara, Alambushaa, Alarka, Avataara/incarnation, Avantikaa, Avabhritha etc.)  

Avasphurja - Ashoucha  (Avi, Avijnaata, Avidyaa, Avimukta, Aveekshita, Avyakta, Ashuunyashayana, Ashoka etc.)

Ashoucha - Ashva (Ashma/stone, Ashmaka, Ashru/tears, Ashva/horse etc.)

Ashvakraantaa - Ashvamedha (Ashwatara, Ashvattha/Pepal, Ashvatthaamaa, Ashvapati, Ashvamedha etc.)

Ashvamedha - Ashvinau  (Ashvamedha, Ashvashiraa, Ashvinau etc.)

Ashvinau - Asi  (Ashvinau, Ashtaka, Ashtakaa, Ashtami, Ashtaavakra, Asi/sword etc.)

Asi - Astra (Asi/sword, Asikni, Asita, Asura/demon, Asuuyaa, Asta/sunset, Astra/weapon etc.)

Astra - Ahoraatra  (Astra/weapon, Aha/day, Ahamkara, Ahalyaa, Ahimsaa/nonviolence, Ahirbudhnya etc.)  

Aa - Aajyapa  (Aakaasha/sky, Aakashaganga/milky way, Aakaashashayana, Aakuuti, Aagneedhra, Aangirasa, Aachaara, Aachamana, Aajya etc.) 

Aataruusha - Aaditya (Aadi, Aatma/Aatmaa/soul, Aatreya,  Aaditya/sun etc.) 

Aaditya - Aapuurana (Aaditya, Aanakadundubhi, Aananda, Aanarta, Aantra/intestine, Aapastamba etc.)

Aapah - Aayurveda (Aapah/water, Aama, Aamalaka, Aayu, Aayurveda, Aayudha/weapon etc.)

Aayurveda - Aavarta  (Aayurveda, Aaranyaka, Aarama, Aaruni, Aarogya, Aardra, Aaryaa, Aarsha, Aarshtishena, Aavarana/cover, Aavarta etc.)

Aavasathya - Aahavaneeya (Aavasathya, Aavaha, Aashaa, Aashcharya/wonder, Aashvin, Aashadha, Aasana, Aasteeka, Aahavaneeya etc.)

Aahavaneeya - Aahlaada (Aahavaneeya, Aahuka, Aahuti, Aahlaada etc. )

 

 

Puraanic contexts for words like Aadi, Aatma/Aatmaa/soul, Aatreya,  Aaditya/sun etc. are given here.

आटरूष भविष्य १.१९३.९( आटरूष दन्तकाष्ठ का महत्त्व ), स्कन्द ७.१.१७( आटरूष दन्तकाष्ठ का महत्त्व )

 आडि पद्म १.४४.५०( बक - भ्राता, पार्वती रूप धारण करके शिव के निकट गमन, शिव द्वारा वध ), ब्रह्माण्ड २.३.७२.७४( छठां आडि - बक नामक देवासुर संग्राम ), मत्स्य १५६( अन्धक - पुत्र, बक - भ्राता, तप से वर प्राप्ति, पार्वती रूप धारण, शिव द्वारा वध ), मार्कण्डेय ९.१०( परस्पर शाप - प्रतिशाप के कारण वसिष्ठ का आडि व विश्वामित्र का बक बनना, आडि - बक युद्ध का वर्णन ), वायु ८८.२५/२.२६.२५( आडि - बक नामक देवासुर संग्राम में इन्द्र का ककुत्स्थ राजा का वाहन बनना ), स्कन्द  १.२.२९.१०( आडि दैत्य द्वारा पार्वती का रूप धारण, शिव द्वारा वध ), लक्ष्मीनारायण ३.१००.२०( आडी - बक नामक देवासुर संग्राम में शक्र/विष्णु द्वारा जम्भ के वध का उल्लेख ) Aadi/ adi

 

आतप भागवत ६.६.१६( विभावसु व उषा - पुत्र, पञ्चयाम - पिता ), ११.१९.९( आतपत्र : उद्धव द्वारा कृष्ण के चरणयुगल की आतपत्र से उपमा ), द्र. शातातप Aatapa

 

आतापी लक्ष्मीनारायण १.५४५.८( इल्वल व वातापी - भ्राता, अगस्त्य के समक्ष आतापी का पर्णशाला व वातापी का फल बनना, अगस्त्य द्वारा भस्म करना ) Aataapee/ atapi

 

आत्म देवीभागवत ७.३६.६( प्रणव धनुष, शर आत्मा, ब्रह्म लक्ष्य - प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।), पद्म १.१९.३०२( आत्मा के यमन से यम की प्राप्ति का कथन - न यमं यममित्याहुरात्मा वै यम उच्यते आत्मा वै यमितो येन स यमस्तु विशिष्यते ), २.७+ ( ज्ञान का संग त्याग पञ्चेन्द्रियों से मैत्री पर आत्मा को दुःख प्राप्ति, वीतराग के उपदेश से विवेक, ज्ञान प्राप्ति-एतेषां संगतिं ज्ञान कस्माद्वारयते भवान् तन्मे त्वं कारणं ब्रूहि याथातथ्येन पंडित ), २.१२०.३०( आत्मा के शुद्धात्मा व अन्तरात्मा भेदों का कथन - अंतरात्मा प्रबद्धस्तु प्रकृतेश्च महागुणैः अन्नाहारेण संपुष्टैरंतरात्मा सुखं व्रजेत् ), ६.२२६.२७( मकार रूपी पञ्चविंश आत्मा का कथन - बकारेण भकारेण महान्प्रकृतिरुच्यते आत्मा तु स मकारः स्यात्पंचविंशः प्रकीर्तितः  ), ब्रह्म २.४७( आत्म ज्ञान प्राप्ति हेतु आत्म तीर्थ का कथन, दत्तात्रेय द्वारा शिव की स्तुति - आत्मतीर्थमिति ख्यातं भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम्।), ब्रह्मवैवर्त्त ३.७.७४( नारायण आत्मा, मन ब्रह्मा, ज्ञान रूपी महेश्वर, पांच प्राण विष्णु, बुद्धि ईश्वरी आदि का उल्लेख - अहमात्मा मनो ब्रह्मा ज्ञानरूपो महेश्वरः ।। पञ्च प्राणाः स्वयं विष्णुर्बुद्धिः प्रकृतिरीश्वरी ।। ), ब्रह्माण्ड १.२.३२.१०४( आत्मवान् : २१ मन्त्रकर्ता भार्गव ऋषियों में से एक ), भविष्य ४.१८५( आत्म प्रतिकृति दान विधि - आत्मनः प्रतिमा चेयं सर्वोपकरणैर्युता ।। सर्वरत्नसमायुक्ता तव विप्र निवेदिता ।। ), भागवत ६.४.४६( धर्म के आत्मा होने का उल्लेख - अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः), ११.२३.४५( आत्मा के जीव का सनातन सखा होने का उल्लेख, आत्मा = सुपर्ण ; आत्मा द्वारा मन रूप सखा पर आश्रित होने पर गुणों से निबद्ध होने का कथन - अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे ), ११.२८.११( आत्मा, माया से परे की स्थिति -  आत्माव्ययोऽगुणः शुद्धः स्वयंज्योतिरनावृतः । ), मत्स्य १४५.९८( आत्मवान् : १९ मन्त्रकर्ता भार्गव ऋषियों में से एक - भृगुः काश्यपः प्राचेता दधीचो ह्यात्मवानपि।। ), वायु ५९.९६( आत्मवान् : २१ मन्त्रकर्ता भार्गव ऋषियों में से एक - भृगुः काव्यः प्रचेतास्तु दधीचो ह्यात्मवानपि । ), ६५.९०/२.४.९०( आत्मवान् : च्यवन व सुकन्या - पुत्र, दधीचि भ्राता - जनयामास पुत्रौ द्वौ सुकन्यायाञ्च भार्गवः। आत्मवानं दधीचञ्च तावुभौ साधुसंमतौ ।। ), स्कन्द १.१.२०.९( परा आत्मा के त्रिगुणों के लीन हो जाने से आत्मा की लिङ्ग संज्ञा का कथन - एक एव परो ह्यात्मा लिंगरूपी निरंजनः॥ प्रकृत्या सह ते सर्वे त्रिगुणा विलयं गताः॥), २.६.२.११( राधा के आत्माराम कृष्ण की ध्रुव आत्मा होने का उल्लेख - आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका ।। तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान्न संस्पृशेत् ।। ), ५.२.६२.२२( आत्मा का आत्मा बन्धु इत्यादि श्लोक - आत्मनो बंधुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः । आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ।। ), ५.३.१५९.८( गुरु के आत्मवानों का शास्ता होने का उल्लेख - गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम् । ), महाभारत आश्वमेधिक २५.१५ ( ब्रह्मात्मा/बुद्धि के उद्गाता होने का उल्लेख? - कर्ताऽनुमन्ता ब्रह्मात्मा होताऽध्वर्युः कृतस्तुतिः ), योगवासिष्ठ ३.१.१२( आत्मा के ऋत व परब्रह्म के सत्य होने का उल्लेख ; मन की भूतात्मा संज्ञा - ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्यमित्यादिका बुधैः । ), ३.६३.२( आत्मा की सर्वशक्तिता के कारण आत्मा द्वारा विभिन्न शक्तियों को आंशिक रूप में प्रकट करना - एष त्वात्मा सर्वशक्तित्वाच्च क्वचिच्चिच्छक्तिं प्रकटयति क्वचिच्छान्तिं क्वचिज्जडशक्तिं क्वचिदुल्लासं क्वचित्किंचिन्न किंचित्प्रकटयति ।। ), ४.२२( विशुद्ध ज्ञान प्राप्त होने पर आत्मा की प्रसन्नता का वर्णन ), ६.१.५९( आत्म अवबोध हेतु चित्त स्पन्दन - अस्पन्दन ज्ञान का कथन - योऽयमन्तश्चितेरात्मा सर्वानुभवरूपकः । ), ६.२.४०( आत्मा की विश्रान्ति पर जगत का स्वप्नवत् भासित होना ), ६.२.७३( विराट आत्मा की स्थिति का वर्णन ), महाभारत वन ३१३.७१( पुत्र के आत्मा होने का उल्लेख : यक्ष - युधिष्ठिर संवाद - पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा। ), शान्ति ७३.१९/७३.५७( मनुष्य की देह में आत्मा के रुद्र होने का कथन - आत्मा रुद्रो हृदये मानवानां स्वं स्वं देहं परदेहं च हन्ति। वातोत्पातैः सदृशं रुद्रमाहुर्देवं जीमूतैः सदृशं रूपमस्य।। ),२०३, २१८.७(आत्माऽसौ वर्तते भिन्नस्तत्रतत्र समन्वितः।परमात्मा तथवैको देवेऽस्मिन्निति वै श्रुतिः।।), २१८.१९(आत्मा च परमः शुद्धः प्रोक्तोऽसौ परमः पुमान्।।, लक्ष्मीनारायण २.३९.९( आत्मा नदी, शील तीर्थ, सत्य जल - आत्मा नदी शीलतीर्था सत्यजला शमान्विता । तत्स्नातः शुद्ध्यति पुण्यो वारिणाऽऽत्मा न शुद्ध्यति ।। ), २.२५७.२( देह के विभिन्न अङ्गों से आत्मा के विनिष्क्रमण पर विभिन्न लोकों की प्राप्ति का वर्णन - पद्भ्यां निर्गत्य चेद्याति विष्णुस्थानं प्रयाति वै ।। जंघाभ्यां चेत्प्रयात्येषो वसूनां याति मन्दिरम् । ), ३.१०६.७( आत्मा : औरस पुत्र का रूप - आत्मा पुत्र औरसः स्वः पिता स्वयं स कथ्यते । ), ४.१०१.१०९( आत्मबोधिनी : कृष्ण व पिङ्गला - पुत्री - पिंगलायाः सुतः पिताम्बरः सुताऽऽत्मबोधिनी ।।) Aatma/ aatmaa/atma

Vedic contexts on Aatma

 

आत्मदेव पद्म ६.१९६.१९( धुन्धली - पति, धुन्धुकारी व गोकर्ण - पिता, भागवत माहात्म्य प्रसंग )

 

आत्रेय ब्रह्म २.७०( इन्द्र के वैभव की स्पर्द्धा में आत्रेय द्वारा कृत्रिम इन्द्रपुरी का निर्माण, असुरों द्वारा इन्द्र के भ्रम में आत्रेय का बन्धन, आत्रेय द्वारा इन्द्र की स्तुति व पूर्व स्थिति में लौटना ), ब्रह्माण्ड १.२.११.२२( अनसूया से पांच आत्रेय पुत्रों का जन्म ), महाभारत शान्ति २३४.२२, अनुशासन १५०.३४, वराह १०.२०( आत्रेय द्वारा राजा सुप्रतीक को पुत्र प्राप्ति का वरदान, इन्द्र को शाप ), १८७.२८( निमि - पुत्र, आत्रेय की मृत्यु पर निमि का शोक, श्राद्ध करना ), वायु ६२.१७( स्वारोचिष मन्वन्तर में ऋषि ), ६२.४१/२.१.४१( तामस मन्वन्तर में ऋषि ), ६२.५४/२.१.५४( रैवत मन्वन्तर में ऋषि ), १००.११/२.३८.११( भविष्य के मन्वन्तर के सप्तर्षियों में से एक ), १००.६७/२.३८.६७( नवम मन्वन्तर में ऋषि ), १००.८२( ११वें मन्वन्तर में ऋषि ), १००.९६( १२वें मन्वन्तर में ऋषि ), १००.१०७( १३वें मन्वन्तर में ऋषि ), शिव ५.३४.४१( दशम मन्वन्तर में ऋषियों में से एक? ), ५.३४.४६( दशम मन्वन्तर में सप्तर्षियों में से एक ), स्कन्द ३.२.९.९५( आत्रेय गोत्र के ऋषियों के ५ प्रवरों व गुणों का कथन ), ७.१.२५७( सौराष्ट्र देश में विप्र, एकत, द्वित व त्रित का पिता, त्रित के कूप में पतन की कथा ), द्र. स्वस्त्यात्रेय Aatreya/ atreya

 

आत्रेयी ब्रह्म २.७४( अत्रि - पुत्री, अङ्गिरस - पत्नी, पति के परुष वचनों की शान्ति के लिए परुष्णी नदी बनना ), वामन ८२.४( वीतमन्यु - भार्या, उपमन्यु - माता, पुत्र को क्षीर प्राप्ति हेतु विरूपाक्ष शिव की आराधना करने का आदेश ), द्र. अपाला Aatreyee

 

आदम भविष्य ३.१.४.१८( हव्यवती - पति, विष्णु कर्दम से उत्पत्ति, आत्म ध्यान परायण, पाप वृक्ष के नीचे फल भक्षण, म्लेच्छ पुत्रों की उत्पत्ति )

 

आदिकेश ब्रह्म २.९९.३( वेद व व्याध द्वारा आदिकेश शिव की भक्ति, व्याध की भक्ति से आदिकेश शिव का प्रसन्न होना )

 

आदित्य अग्नि ५१.५( मास अनुसार द्वादश आदित्यों के स्वरूप, वर्ण व शक्तियां - वरुणः सूर्यनामा च सहस्रांशुस्तथापरः धाता तपनसञ्ज्ञश्च सविताथ गभस्तिकः ।। ), गरुड ३.५.३२(६ आदित्यों के नाम - दश रुद्रा इति प्रोक्ताः षडादित्याञ्छृणु द्विज । उरुक्रमस्तथा शक्रो विवस्वान्वरुणस्तथा ॥ ), नारद १.७०.२०( द्वादश आदित्यों का महाविष्णु की १२ मूर्तियों के साथ न्यास - अयं तत्त्वाभिधो न्यासः सर्वन्यासोत्तमोत्तमः । मूर्तीर्न्यसेद्द्वादश वै द्वादशादित्यसंयुताः ।।), १.१२१.५४( आदित्य द्वादशी व्रत : १२ आदित्यों के नाम - एतस्यामेव विदितं द्वादशादित्यसंज्ञितम् ।। व्रतं तत्रार्चयेद्धीमानादित्यान्द्वादशापि च ।। ), पद्म १.६.३५( चाक्षुष मन्वन्तर के तुषित देवों का वैवस्वत मन्वन्तर में १२ आदित्य बनना, आदित्यों के नाम - तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यांतरे मनोः वैवस्वतेंतरे चैव आदित्या द्वादश स्मृताः ), १.२५( आदित्य शयन व्रत, नक्षत्रों में सूर्य नाम व न्यास ), १.४०.१४५( अव्यक्त आनन्द सलिल वाले समुद्र में १२ आदित्यों की महाद्वीपों से उपमा - द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादशपत्तनम्॥ ), ४.२२.२९( आदित्यवर्चस : व्याध द्वारा आदित्यवर्चस के वध की संक्षिप्त कथा ), ब्रह्म १.२८.२८( १२ आदित्य मूर्तियों की विश्व में स्थिति का वर्णन - तस्य या प्रथमा मूर्तिरादित्यस्येन्द्रसंज्ञिता। स्थिता सा देवराजत्वे देवानां रिपुनाशिनी॥ ), ब्रह्माण्ड १.२.२३.१( आदित्य रथ व्यूह का वर्णन - सरथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्मुनिभिस्तथा ।। गंधर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः ।। ), भविष्य १.४८+ ( साम्बादित्य का माहात्म्य : साम्ब व वासुदेव का संवाद - प्रत्यक्षं देवता सूर्यो जगच्चक्षुर्दिवाकरः । तस्मादभ्यधिका काचिद्देवता नास्ति शाश्वती । ।), १.५०.१( मास अनुसार आदित्यों के नाम - एवं वै फाल्गुने सूर्यं चैत्रे वैशाख एव च । वैशाखे मासि धातारमिन्द्रं ज्येष्ठे यजेद्रविम् । । ), ३.४.६.५५+ ( ब्राह्मण रूप धारी इन्द्र, धाता आदित्यों के विशिष्ट कार्यों का वर्णन ) ३.४.७.५(धातृशर्मा द्विज का चैत्रमास के आदित्य रूप में जन्म), ३.४.७.८५( निम्बादित्य : अरुण व जयन्ती - पुत्र, सुदर्शन चक्र के तेज का अवतार, निम्ब में तेज स्थापना से कृत्रिम सूर्य का निर्माण ), ३.४.१८.१६( संज्ञा के स्वयंवर में आदित्यों का असुरों से युद्ध - पांचजन्यस्तथा धाता हयग्रीवश्च मित्रकः ।।अघासुरोऽर्यमा चैव बलः शक्रस्तथैव च ।। ), ४.४४( आदित्य मण्डल दान विधि - आदित्यतेजसोत्पन्नं राजतं विधिनिर्मितम् ।। श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतिगृह्णेदमुत्तमम् ।। ), भागवत ६.६.३९( १२ अदिति - पुत्रों के नाम - विवस्वानर्यमा पूषा त्वष्टाथ सविता भगः धाता विधाता वरुणो मित्रः शत्रु उरुक्रमः ), ६.१८.१( सविता, भग, धाता, वरुण, मित्र, विष्णु नामक आदित्यों की भार्याएं व पुत्र - पृश्निस्तु पत्नी सवितुः सावित्रीं व्याहृतिं त्रयीम् अग्निहोत्रं पशुं सोमं चातुर्मास्यं महामखान् ), मत्स्य १९.३( प्रपितामह का रूप ), ५५( आदित्य शयन व्रत की विधि व माहात्म्य, नक्षत्र अनुसार आदित्य न्यास - आदित्यशयनं नाम यथावच्छंकरार्चनम् येषु नक्षत्रयोगेषु पुराणज्ञाः प्रचक्षते ), ९७( आदित्य वार कल्प विधान, द्वादश दल कमल पर दिशा अनुसार आदित्य पूजा - यत्तद्विश्वात्मनो धाम परं ब्रह्मसनातनम्। सूर्य्याग्निचन्द्ररूपेण तत्त्रिधा जगति स्थितम्।। ), १७२.३३( आदित्य नारायण : सागर में महाद्वीप का रूप - द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादश पत्तनम् ।। वस्वष्ट पर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भो महोदधिम्। ), लिङ्ग १.५९( मास अनुसार आदित्यों के नाम, रश्मि संख्या व वर्ण - उत्तिष्ठति पुनः सूर्यः पुनर्वै प्रविशत्यपः।। तस्मात्ताम्रा भवंत्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात्।। ), वराह ६२( सार्वभौम राजा द्वारा पद्म ग्रहण के प्रयास से कुष्ठ प्राप्ति, आदित्य आराधना से मुक्ति- तत्रापश्यद् बृहद् पद्मं सरोमध्यगतं सितम् ।। तत्र चाङ्गुष्ठमात्रं तु स्थितं पुरुषसत्तमम् । ), ९४.६( आदित्यों का १२ महिषासुर - सेनानियों से युद्ध - यथासंख्येन तद्वच्च दैत्या द्वादश चापरे । आदित्यान् दैत्यवर्यास्तु तेषां प्राधान्यतः श्रृणु ।। ), १३८( आदित्य तीर्थ माहात्म्य के अन्तर्गत खञ्जरीट का मनुष्य बालक बनना - एवं स खञ्जरीटो हि गङ्गातोयात्ततस्तदा ।। आदित्यतीर्थसंक्लिन्नशरीरः स वसुन्धरे ।।), १५६.१४( कृष्ण द्वारा यमुना में कालिय दमन के पश्चात् द्वादश आदित्यों की स्थापना - सूर्यतीर्थेषु वसुधे द्वादशादित्यसंज्ञिके ।। कालियो रमते तत्र कालिंद्याः सलिले शुभे।। ), १७७( साम्ब द्वारा प्रात: आदि तीन कालों में तीन आदित्यों की आराधना - यथोदयाचले देवमाराध्य लभते फलम् ।। मथुरायां तथा गत्वा षट्सूर्ये लभते फलम् ।। ), वायु ६६.४४( रात्रि के १५ मुहूर्त्तों में से एक - ब्रह्मसौम्यस्तथादित्यो बार्हस्पत्योऽथ वैष्णवः।एकरात्रिमुहूर्त्ताः स्युः क्रमोक्ता दश पञ्च च। ), १०१.३०/२.३९.३०( आदित्यों की भुव:लोक में स्थिति का उल्लेख - आदित्या ऋभवो विश्वे साध्याश्च पितरस्तथा। ऋषयोऽङ्गिरसश्चैव भुवर्ल्लोकं समाश्रिताः ।। ), विष्णु १.१५.१३२( चाक्षुष मन्वन्तर के तुषित देवों का वैवस्वत मन्वन्तर में आदित्य बनना - पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन्सुरोत्तमाः । तुषिता नाम तेऽन्योन्यमूचुर्वैवस्वतेन्तरे ॥ ), विष्णुधर्मोत्तर १.१२०.३( विष्णु के अंश साध्यगण का अदिति के गर्भ से जन्म लेकर १२ आदित्य बनना - त्वष्टा विवस्वान्वरुणो विष्णुर्द्वादशमस्तथा ।। विष्णोरंशेन संभूताः साध्या देवगणा नृप ।।  ), ३.१८२( द्वादश आदित्य व्रत विधि - धाता मित्रोर्यमा पूषा शक्रेशो वरुणो भगः ।। त्वष्टा विवस्वान्सविता विष्णुर्द्वादशकस्तथा।। ), ३.३२१.१४( दया से आदित्य लोक की प्राप्ति - आदित्यैः सह मोदंते दयावन्तस्तु ये नराः ।। ), शिव २.१.१२.३३( आदित्यों द्वारा ताम्रमय लिङ्ग की पूजा - लक्ष्मीश्च स्फाटिकं देवी ह्यादित्यास्ताम्रनिर्मितम् ।। ), २.५.३६.१४( आदित्य गण का शङ्खचूड - सेनानियों से युद्ध - धूम्रेण संहलेनापि विश्वेन च प्रतापिना ।। पलाशेन द्वादशाऽर्का युयुधुर्धर्मतः परे ।। ), ५.३.२८( घोर संवर्तक आदित्य का शाप से कृष्ण - पुत्र साम्ब बनने का उल्लेख - घोरसंवर्तकादित्यश्शप्तो मुनिभिरेव च ।। मानुषो भवितासीति स ते पुत्रो भविष्यति ।।), स्कन्द १.२.४३.१६( भट्ट/नारद द्वारा स्थापित भट्टादित्य का माहात्म्य ), १.२.४९.१( जयादित्य की उत्पत्ति का वर्णन ), १.२.५१.५४( कमठ द्विज बालक द्वारा स्थापित जयादित्य का माहात्म्य ), ३.१.४९.५४( आदित्य - कृत रामेश्वर शिव की संक्षिप्त स्तुति - नमस्तेऽस्तु महादेव रामनाथ त्रियंबक । दक्षाध्वरविनाशाय नमस्ते पाहि मां शिव ।।), ४.१.४६.४५( काशी में १२ आदित्यों के नाम - इति काशीप्रभावज्ञो जगच्चक्षुस्तमोनुदः ।। कृत्वा द्वादशधात्मानं काशीपुर्यां व्यवस्थितः ।।), ४.२.५१.२८( वृद्ध आदित्य का माहात्म्य : वृद्ध हारीत द्वारा आराधना से तारुण्य प्राप्ति - पुरात्र वृद्धहारीतो वाराणस्यां महातपाः ।।पुनस्तारुण्यमाप्तोहं चरिष्याम्युत्तमं तपः ।। ), ४.२.५१.४४( आदित्यों द्वारा केशव/हरि के निर्देश पर केशवादित्य नामक शिवलिङ्ग की आराधना - अतः परं शृणु मुने केशवादित्यमुत्तमम् ।। यथा तु केशवं प्राप्य सविता ज्ञानमाप्तवान् ।। ), ४.२.५१.८३( विमल क्षत्रिय द्वारा कुष्ठ से मुक्ति हेतु विमलादित्य की स्थापना -अतः परं शृणु मुने विमलादित्यमुत्तमम् ।। हरिकेशवने रम्ये वाराणस्यां व्यवस्थितम्।।), ४.२.५१.१०१( आदित्यों द्वारा गङ्गा की आराधना - यदा गंगा समायाता भगीरथपुरस्कृता ।। तदा गंगां परिष्टोतुं रविस्तत्रैव संस्थितः ।। ), ४.२.८४.१७( आदित्य केशव तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य - आदित्यकेशवं नाम तदग्रे तीर्थमुत्तमम् ।। कृताभिषेकस्तत्रापि लभेत्स्वर्गाभिषेचनम् ।। ), ५.१.७०.५१( १२ आदित्यों के नाम - अरुणः सूर्यो वेदांगो भानुरिन्द्रो रविरंशुमान् ।। सुवर्णरेताऽहःकर्ता मित्रो विष्णुः सनातनः ।। ), ५.३.१७.१३( सृष्टि संहरण काल में १२ आदित्यों का रुद्र मुख से उत्पन्न होकर भूमण्डल को जलाना - ददहुर्वै जगत्सर्वमादित्या रुद्रसम्भवाः ॥ आदित्यानां रश्मयश्च संस्पृष्टा वै परस्परम् । ), ५.३.२८.१२( बाण के त्रिपुर नाश हेतु शिव के रथ में आदित्य व चन्द्र के रथचक्र में स्थित होने का उल्लेख - आदित्यचन्द्रौ चक्रे तु गन्धर्वानारकादिषु ॥ ), ५.३.५९( आदित्य तीर्थ का माहात्म्य - यस्त्र्यक्षरं जपेन्मन्त्रं ध्यायमानो दिवाकरम् । आदित्यहृदयं जप्त्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ), ५.३.६०( आदित्य तीर्थ का माहात्म्य, तीर्थ में स्नान से ब्रह्महत्या आदि पापों का कुरूपा स्त्रियों के रूप में अलग होना - चित्रभानुः स्मृतस्तैस्तु विचिन्त्य हृदये हरिम् । स्नात्वा रेवाजले पुण्ये तर्पिताः पितृदेवताः ॥ ), ५.३.१५३( आदित्येश्वर तीर्थ का माहात्म्य, जाबालि द्वारा कुष्ठ निवारण हेतु तप - कुतस्तद्भास्करं तीर्थं भो द्विजाः कथ्यतां मम ॥ तपस्तप्याम्यहं गत्वा तस्मिंस्तीर्थे सुभावितः ॥ ), ५.३.१९१( द्वादश आदित्य तीर्थ माहात्म्य, द्वादश आदित्यों की प्रलय काल में दिशाओं के सापेक्ष स्थिति - यथैव ते महाराज दहन्ति सकलं जगत् ॥ तथैव द्वादशादित्या भक्तानां भावसाधनाः ।), ५.३.२३१.११( रेवा - सागर संगम पर १० आदित्य तीर्थों की स्थिति का उल्लेख - दशादित्यभवान्यत्र नवैव कपिलेश्वराः ॥ ), ६.५६( साम्बादित्य का माहात्म्य : गालव द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए आराधना - येयं त्वया कृता मेऽर्चा सांबसूर्यस्य संनिधौ ॥ सांबसूर्याभिधानोऽयं भविष्यति धरातले॥। ), ६.६०.९( नरादित्य का माहात्म्य : अर्जुन द्वारा स्थापित सूर्य आदित्य ), ६.१५५.१९+ ( पुष्पादित्य का माहात्म्य, याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापना, पुष्प षण्ढ द्वारा आराधना का वृत्तान्त ), ६.२५२.३४( चातुर्मास में आदित्यों की जपा वृक्ष में स्थिति का उल्लेख - आदित्यैस्तु जपावृक्षो ह्यश्विभ्यां मदनस्तथा ॥ ), ६.२७८.९६( याज्ञवल्क्य द्वारा पुन: वेद प्राप्ति के लिए १२ आदित्यों की स्थापना - यानि सूक्तानि ऋग्वेदे मदीयानि द्विजोत्तम ॥ सावनानि यजुर्वेदे सामानि च तृतीयके ॥ ), ७.१.१७ ( आदित्य की निरुक्ति, माहात्म्य - सर्वेषामेव देवानामादिरादित्य उच्यते ॥ आदिकर्त्ता त्वसौ यस्मादादित्यस्तेन चोच्यते॥), ७.१.४३( आदित्येश्वर लिङ्ग का माहात्म्य : समुद्र द्वारा रत्नों से पूजा - सोमेशात्पश्चिमे भागे धनुषां सप्तके स्थितम्॥ आदित्येश्वरनामानं सर्वपातकनाशनम् ॥ ), ७.१.१००+ ( साम्बादित्य का माहात्म्य ), ७.१.१०१.५८( आदित्य के १२ अतिरिक्त नाम, मास अनुसार आदित्यों के नाम, रश्मि संख्या - विष्णुस्तपति वै चैत्रे वैशाखे चार्यमा सदा ॥ विवस्वाञ्ज्येष्ठमासे तु आषाढे चांशुमांस्तथा ॥), ७.१.११८( गोप्यादित्येश्वर का माहात्म्य : कृष्ण की १६ सहस्र गोपियों/१६ कलाओं द्वारा स्थापना - चन्द्ररूपी ततः कृष्णः कलारूपास्तु ताः स्मृताः ॥ १३ ॥ संपूर्णमण्डला तासां मालिनी षोडशी कला ॥ ), ७.१.१२८.२१( २१ आदित्यों के नाम - विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः ॥ लोकप्रकाशकः श्रीमाँल्लोकचक्षुर्ग्रहेश्वरः ॥... ), ७.१.१३९.११( तीर्थों में आदित्यों के नाम - मुंडीरस्वामिनं प्रातर्गंगासागरसंगमे ॥ कालप्रियं तु मध्याह्ने यमुनातीरमाश्रितम् ॥.. ), ७.१.२५६( नन्दादित्य का माहात्म्य, नन्द राजा द्वारा पद्म ग्रहण के प्रयास से कुष्ठ रोग प्राप्ति, आदित्य आराधना से कुष्ठ से मुक्ति ), ७.१.३०५( नारदादित्य का माहात्म्य : नारद द्वारा जरा से मुक्ति हेतु नारदादित्य की आराधना - आराध्य नारदो देवि भास्करं वारितस्करम् ॥ जरा निर्मुक्तदेहस्तु तत्क्षणात्समपद्यत ॥ ), हरिवंश १.३.६२( चाक्षुष मन्वन्तर के तुषित देवों का वैवस्वत मन्वन्तर में आदित्य बनना - चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासन् ये तुषिताः सुराः । वैवस्वतेऽन्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः ।। ),महाभारत आदि २२६.३४ (धाता, जय आदि आदित्यों का खाण्डव दाह प्रसंग में कृष्ण व अर्जुन से युद्ध -जगृहे च धनुर्धाता मुसलं तु जयस्तथा। पर्वतं चापि जग्राह क्रद्धस्त्वष्टा महाबलः।।)वन ३१३.४५( आदित्य के उदित व अस्त होने में ब्रह्म व धर्म के कारण होने का कथन : यक्ष - युधिष्ठिर संवाद - ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितश्चराः। धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ॥  ), अनुशासन १०२.३२ (आदित्य लोक को प्राप्त होने वाले मनुष्य के लक्षण : इन्द्र गौतम संवाद - आदित्यदेवस्य पदं महात्मनस्तत्र त्वाऽहं हस्तिनं यातयिष्ये।। ), योगवासिष्ठ ४.३६( चिदादित्य के स्वरूप का वर्णन ), वा.रामायण ६.१०५( आदित्य हृदय स्तोत्र, रावण पर विजय हेतु अगस्त्य द्वारा राम को कथन ), लक्ष्मीनारायण १.८३.५६( काशी में दिवोदास के राज्य में स्थित आदित्य के १२ रूपों के नाम - लोकार्क उत्तरार्कश्च साम्बादित्यः खखोलकः ।। द्रुपदादित्यो मयूखाऽऽदित्यस्तथाऽरुणाऽऽह्वयः ।.. ), १.२०८.२२( आदित्य तीर्थ : आदित्यों द्वारा तप करके सूर्यता प्राप्ति ), १.३११.३७( आदित्यवर्णा : समित्पीयूष नृप की ७ पत्नियों में से एक, कृष्ण को कटक व भुजबन्ध अर्पित करना - आदित्यवर्णा प्रददौ कटके भुजबन्धकौ । ), १.३५३.२८( साम्ब द्वारा कुष्ठ से मुक्ति हेतु मथुरा में ६ सूर्यों की आराधना - ब्राह्मं तथोदयन्त च ह्यूर्ध्वं यान्तं च मध्यगम् ।। नमन्तं चाप्यस्तगतं नित्यं साम्बः समार्चयत् । ), १.४४१.८८( आदित्यों का जपा वृक्ष रूप में अवतरण - प्रियाला वसवो जाता आदित्यास्तु जपाद्रुमाः ।), १.५३८.४६( १२ आदित्यों द्वारा मास अनुसार प्रभास क्षेत्र में स्नान - विष्णुः संस्नाति वै चैत्रे वैशाखे त्वर्यमा तथा । विवस्वान् ज्येष्ठमासेऽथ चाषाढे त्वंशुमाँस्तथा ।।..), १.५४३.७६( दक्ष द्वारा आदित्य को अर्पित १२ कन्याओं के नाम - आदित्येभ्यो ददौ दक्षो द्वादश कन्यकाश्च ताः । प्रभावती सुभद्रा च विमला निर्मला वृता ।।७६।।.. ), २.१७८.६१( आरण्यक मुनि व उनके २५ सहयोगी ऋषियों का १४ मनु व १२ आदित्य बनना, पुन: १२ आदित्यों का राजाओं के रूप में जन्म - अथाऽऽसन् द्वादश सूर्या मुद्राण्डः प्रथमोऽभवत् । लीनोर्णोऽर्को द्वितीयोऽभूद् वृहच्छरस्तृतीयकः ।।..), ३.४५.२७( पञ्चाग्नि तप से आदित्य मण्डल की प्राप्ति का उल्लेख - पञ्चाग्नितापसा यान्ति चादित्यमण्डलं जनाः । कामिनश्चान्द्रलोकं च शीतदानपरायणाः ।। ), ३.५३.१००( ब्रह्मा द्वारा स्वपुत्रों को कर्म में प्रवृत्त होने का आदेश, पुत्रों का आदित्य नाम - त एव तुषिता बोध्याः सत्यास्त एव सन्ति च । हरयश्चापि वैकुण्ठाः साध्या आदित्यका अपि ।।  ), कथासरित् १.५.५९( आदित्यवर्मा : राजा,मन्त्री शिववर्मा के वध की युक्ति ), ३.४.६९( आदित्यसेन : उज्जयिनी का राजा, श्रीवृक्षक नामक अश्व की सहायता से कठिनाइयों पर विजय का वर्णन, विदूषक ब्राह्मण द्वारा पुत्री की रक्षा ), ७.८.२००( आदित्यप्रभा : विद्याधर - कन्या, पद्मसेन - भार्या, श्वसुर के शाप से यमदंष्ट्रा रूप में जन्म लेना ), ८.६.१५९( आदित्यशर्मा : सुलोचना नामक यक्षिणी को सिद्ध करके उससे पुत्र प्राप्त करना ), द्र. कोणादित्य, चन्द्रादित्य, जयादित्य, नरादित्य, बालादित्य, भट्टादित्य, मधुरादित्य, यमादित्य, रामादित्य, विक्रमादित्य, सूर्य Aaditya/ aditya

 

 

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