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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Anapatya to aahlaada only)

by

Radha Gupta, Suman Agarwal, Vipin Kumar

Home Page

Anapatya - Antahpraak (Anamitra, Anaranya, Anala, Anasuuyaa, Anirudhdha, Anil, Anu, Anumati, Anuvinda, Anuhraada etc.)

Anta - Aparnaa ((Antariksha, Antardhaana, Antarvedi, Andhaka, Andhakaara, Anna, Annapoornaa, Anvaahaaryapachana, Aparaajitaa, Aparnaa  etc.)

Apashakuna - Abhaya  (Apashakuna, Apaana, apaamaarga, Apuupa, Apsaraa, Abhaya etc.)

Abhayaa - Amaavaasyaa (Abhayaa, Abhichaara, Abhijit, Abhimanyu, Abhimaana, Abhisheka, Amara, Amarakantaka, Amaavasu, Amaavaasyaa etc.)

Amita - Ambu (Amitaabha, Amitrajit, Amrita, Amritaa, Ambara, Ambareesha,  Ambashtha, Ambaa, Ambaalikaa, Ambikaa, Ambu etc.)

Ambha - Arishta ( Word like Ayana, Ayas/stone, Ayodhaya, Ayomukhi, Arajaa, Arani, Aranya/wild/jungle, Arishta etc.)

Arishta - Arghya  (Arishtanemi, Arishtaa, Aruna, Arunaachala, Arundhati, Arka, Argha, Arghya etc.)           

Arghya - Alakshmi  (Archanaa, Arjuna, Artha, Ardhanaareeshwar, Arbuda, Aryamaa, Alakaa, Alakshmi etc.)

Alakshmi - Avara (Alakshmi, Alamkara, Alambushaa, Alarka, Avataara/incarnation, Avantikaa, Avabhritha etc.)  

Avasphurja - Ashoucha  (Avi, Avijnaata, Avidyaa, Avimukta, Aveekshita, Avyakta, Ashuunyashayana, Ashoka etc.)

Ashoucha - Ashva (Ashma/stone, Ashmaka, Ashru/tears, Ashva/horse etc.)

Ashvakraantaa - Ashvamedha (Ashwatara, Ashvattha/Pepal, Ashvatthaamaa, Ashvapati, Ashvamedha etc.)

Ashvamedha - Ashvinau  (Ashvamedha, Ashvashiraa, Ashvinau etc.)

Ashvinau - Asi  (Ashvinau, Ashtaka, Ashtakaa, Ashtami, Ashtaavakra, Asi/sword etc.)

Asi - Astra (Asi/sword, Asikni, Asita, Asura/demon, Asuuyaa, Asta/sunset, Astra/weapon etc.)

Astra - Ahoraatra  (Astra/weapon, Aha/day, Ahamkara, Ahalyaa, Ahimsaa/nonviolence, Ahirbudhnya etc.)  

Aa - Aajyapa  (Aakaasha/sky, Aakashaganga/milky way, Aakaashashayana, Aakuuti, Aagneedhra, Aangirasa, Aachaara, Aachamana, Aajya etc.) 

Aataruusha - Aaditya (Aadi, Aatma/Aatmaa/soul, Aatreya,  Aaditya/sun etc.) 

Aaditya - Aapuurana (Aaditya, Aanakadundubhi, Aananda, Aanarta, Aantra/intestine, Aapastamba etc.)

Aapah - Aayurveda (Aapah/water, Aama, Aamalaka, Aayu, Aayurveda, Aayudha/weapon etc.)

Aayurveda - Aavarta  (Aayurveda, Aaranyaka, Aarama, Aaruni, Aarogya, Aardra, Aaryaa, Aarsha, Aarshtishena, Aavarana/cover, Aavarta etc.)

Aavasathya - Aahavaneeya (Aavasathya, Aavaha, Aashaa, Aashcharya/wonder, Aashvin, Aashadha, Aasana, Aasteeka, Aahavaneeya etc.)

Aahavaneeya - Aahlaada (Aahavaneeya, Aahuka, Aahuti, Aahlaada etc. )

 

 

अस्थि

ऋग्वेदे १.१६४.४ कथनमस्ति

को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥
ऋ. १.१६४.

अत्र कथनमस्ति यत् तत् अनस्था कः अस्ति यः अस्थन्वन्तं धारणं करोति। देवीभागवतपुराणे ८.६ कथनमस्ति यत् जम्बूद्वीपे यः जम्बूवृक्षः अस्ति, तस्य फलानि अनस्थिकाः सन्ति। तेभ्यः फलेभ्यः रसस्य नदीनां प्रादुर्भावः भवति - जम्बूफलानां तुङ्गदेशनिपातनात् ॥विशीर्यतामनस्थीनां कुञ्जराङ्गप्रमाणिनाम् । रसेन नदी जम्बूनाम्नी मेर्वाख्यमन्दरात् लोके फलस्य अन्तरे यः बीजः अथवा मज्जा भवति, तत् कठोर अस्थ्ना आवृता भवति। आवर्तनस्य किं कारणमस्ति। या मज्जा अस्ति, तस्याः संधारणाय लोके सम्यक् परिस्थितिः उपलब्धा नास्ति। अतएव, मज्जायाः रक्षणाय कठोर आवरणस्य आवश्यकता भवति। (ऋ. १.१६४.४ सायण भाष्ये कथनमस्ति यत् अव्याकृतावस्थायाम् अनस्थः अशरीरः परमेश्वरो बिभर्ति )। किं कोपि उपायः अस्ति यः कठोरआवरणस्य विकल्पं प्रस्तौति। पुराणेषु जम्बूद्वीपः परोक्षरूपेण वैकल्पिकउपायः अस्ति। जम्बूशब्दस्य यः रूपं वैदिकवाङ्मये अस्ति, तत् जम्भः, मुखः अस्ति। जम्भस्य अधोहनु एवं उपरिहनुः द्यावापृथिव्योः रूपौ स्तः, अयं अनुमानः। किन्तु वैदिकवाङ्मये जम्भस्य देवः अग्नीषोमसंज्ञकः देवः अस्ति। सोमयागे सोमसर्जनाय सोमलता तावत् अन-प्रयुक्ता वसति यावत् प्रवर्ग्यकृत्येभिः अग्नेः तन्मात्रायाः सम्यक् विकासं न भवति। यदा १२ प्रवर्ग्येभिः अग्नेः सम्यक् विकासं भवति, तदनन्तरं अग्नीषोमीयमहः संज्ञकः कृत्यं भवति। अग्नीषोमीय उपस्थानन्तरं अतिथिसोमः सोमरस्य जननाय योग्यः भवति। यः पूर्णिमा अस्ति, तस्य देवता अग्नीषोमः एवास्ति। इतः परं अग्नीषोमदेवतायाः किं वैशिष्ट्यं अस्ति, अन्वेषणीयः।

     ऋग्वेदस्य १.१६४.४ प्रश्नस्य उत्तरं अत्रापि अस्ति - रेतो वै हिरण्यं पशवो घृतं यद्धिरण्यं घृतेऽवदधाति पशुष्वेव रेतो दधाति तस्मादनस्थकाद्रेतसोऽस्थन्वन्तो गर्भाः प्रजायन्ते  काठ सं. २४.५

     देहमध्ये अस्थ्नः यः अस्तित्वं अस्ति, तस्य किं कार्यमस्ति। आधुनिकविज्ञानानुसारेण अस्थिः शोणितस्य अम्लीयता-क्षारीयतायाः नियन्त्रणं करोति। अस्थिषु यः कैल्शियमतत्वः अस्ति, पीएच संतुलनाय तस्य शोणिते लयनं भवति। वैदिकवाङ्मयानुसारेण अस्थिः अपानवायोः नियन्त्रणं करोति  - द्वितीयां चितिं चिनोति सा हास्यैषापान एव तद्वै तदमृतममृतं ह्यपानः सैषाऽमृतचितिस्तदेतन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति तेनास्यैतदमृतम्भवत्यथ पुरीषं निवपति तद्धास्यैतदस्थ्येव तद्वै तन्मर्त्यं मर्त्यं ह्यस्थि तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति तेनास्यैतदमृतं भवति माश १०.१.४.३। अपि च, शतपथब्राह्मणानुसारेण - अस्थिभ्य एवास्य स्वधाऽस्रवत्, स न्यग्रोधोऽभवत्।  - माश १२.७.१.९

अथर्ववेदे ११.१०.२८ कथनमस्ति - आस्तेयीश्च वास्तेयीश्च त्वरणाः कृपणाश्च याः ।

गुह्याः शुक्रा स्थूला अपस्ता बीभत्सावसादयन् ॥ अस्थि कृत्वा समिधं तदष्टापो असादयन् । ११.(१०).२८। अन्यत्र कथनमस्ति यत् अस्थिः आग्नेयी अस्ति, शोणितः वारुणः(काठ.सं १३.२)। अथर्ववेदे कथनमस्ति यत् अस्थिः अष्टप्रकाराणां अपसः नियन्त्रणं करोति। अत्र बीभत्सशब्दः संकेतं करोति किं अयं काव्यशास्त्रस्य वीर, करुण, बीभत्सादि रसानां परिचायकः अस्ति।

 

टिप्पणी : अस्थि शब्द अस्ति का द्योतक है। हरेक जीव की चेतना अस्थि/अस्ति है। - फतहसिंह

     लौकिक रूप में जिसे निधन या मृत्यु कहते हैं, योग मार्ग या भक्ति मार्ग में समाधि की अवस्था को निधन कहते हैं। समाधि से व्युत्थान के पश्चात् प्रथम अवस्था अस्ति, दूसरी भाति, तीसरी प्रिय, चौथी नाम और पांचवीं रूप की होती है(सरस्वती रहस्योपनिषद ३.२३)। पुराणों में इस तथ्य को दधीचि ऋषि के निधन के पश्चात् उनकी अस्थियों से इन्द्र के वज्र निर्माण के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इसके पूर्व दधीचि ऋषि ने देवों के अस्त्रों के तेज को पीकर उन्हें अपनी अस्थियों में आत्मसात् कर लिया था। इस कथा का मूल स्रोत ऋग्वेद १.८४.१३ की सार्वत्रिक ऋचा है।

     अस्थि और समाधि के रूप को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अस्थियों से वृक्ष की उत्पत्ति के प्रतीक का आश्रय लिया गया है। शतपथ ब्राह्मण १२.७.१.९ के वर्णन के अनुसार सौत्रामणि याग के संदर्भ में इन्द्र द्वारा सोमपान करने पर उसकी अस्थियों से स्वधा का स्रवण हुआ जिससे न्यग्रोध वृक्ष उत्पन्न हुआ, मज्जा से व्रीहि उत्पन्न हुए, मांस से स्रवित ऊर्जा से उदुम्बर वृक्ष उत्पन्न हुआ इत्यादि। यहां अस्थियों से उत्पन्न न्यग्रोध वृक्ष का स्वरूप इस प्रकार है कि इसका मूल तो ऊपर की ओर तथा शाखाएं नीचे की ओर हैं, जैसा कि अश्वत्थ के बारे में भी कल्पना की जाती है। लेकिन न्यग्रोध और अश्वत्थ में अन्तर यह है कि न्यग्रोध के मूल से अवरोह या उपमूल निकल कर नीचे की ओर फैला करते हैं जिनसे नये वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण १३.४.४.१० इत्यादि में अस्थियों से खदिर वृक्ष की उत्पत्ति कही गई है। काठक संहिता २५.६ इत्यादि के अनुसार अग्नि के शरीर की अस्थियों से पीतदारु/पूतद्रु वृक्ष का उद्भव हुआ।

     अस्थि और समाधि के संदर्भ को समझने में शतपथ ब्राह्मण १०.४.१.१७ का उल्लेख सहायक होगा। इसके अनुसार लोम, त्वक्, असृक्, मेद, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा यह सब २-२ अक्षरों वाले हैं। इन्हें मिलाकर १६ कलाएं बनती हैं। इनमें विचरने वाला प्राण प्रजापति कहलाता है जो १७वां है। यह १६ कलाएं प्राण प्रजापति के लिए अन्न का आहरण करती हैं। वैदिक साहित्य में अस्थियों का अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी, दोनों अवस्थाओं से सम्बन्ध जोडा गया है। अस्थियों को इष्टकाएं/ईंट कहा गया है जो इष्ट कामना की पूर्ति करती हैं। अस्थियों को ऋग्वेद की ऋचाएं, मज्जा को यजुर्वेद की यजुष और मांस को सामवेद की अर्चियां कहा गया है। यदि ऋक् के साथ यजुष् का कथन किया जाए तो अस्थि का सम्बन्ध मज्जा से जुड जाता है(शतपथ ब्राह्मण १०.५.४.१२)। कहा गया है कि शरीर में ३६० अस्थियां हैं जो संवत्सर के ३६० अहोरात्रों का प्रतीक हैं। अस्थि रूपी ३६० इष्टकाओं का सम्बन्ध मज्जा रूपी ३६० इष्टकाओं से जुडने पर संवत्सर के ७२० दिन व रात्रि बन जाते हैं। यह उल्लेखनीय है कि आयुर्विज्ञान के अनुसार शरीर में लगभग ३०० ही अस्थियां हैं। शतपथ ब्राह्मण १०.५.४.१२ के अनुसार जो ३६? इष्टकाएं बचती हैं, वह संवत्सर के १३वें मास आत्मा का प्रतीक हैं।

     यदि ऋक् के साथ साम का गान किया जाए तो अस्थि का सम्बन्ध मांस से जुड जाता है(जैमिनीय ब्राह्मण १.२५९)। यह भक्ति का रूप है(जैमिनीय ब्राह्मण १.२९७)। ऋक् और साम तथा ऋक् और यजुष् के युगलों से एक ओर दांत वाले पशु जैसे गाय आदि उत्पन्न होते हैं। यदि ऋक् के साथ ऋक् का कथन किया जाए तो वह इस प्रकार है जैसे दोनों ओर दांत वाले हिंसक पशु, क्योंकि दांत भी अस्थि ही हैं। इसके अतिरिक्त, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.५.८ इत्यादि में सौत्रामणि अभिषेक के संदर्भ में अस्थि को वसु कहा गया है। राजा नन्दसावर्णि द्वारा वराह की दन्तास्थि द्वारा धन एकत्र करने की कथा के तत्त्व पर इन तथ्यों को ध्यान में रखकर विचार करने की आवश्यकता है।

     ऐतरेय आरण्यक २.१.६ में लोम को उष्णिक् छन्द, त्वचा को गायत्री, मांस को त्रिष्टुप्, स्नायुओं को अनुष्टुप्, अस्थि को जगती और मज्जा को पंक्ति कहा गया है। दूसरी ओर, काठक संहिता ३८.१४ में सौत्रामणि के संदर्भ में १३वें अधिक मास में कहा गया है कि लोम द्वारा गायत्री में प्रवेश करे, त्वचा द्वारा त्रिष्टुप् में, मांस द्वारा जगती में, अस्थियों द्वारा अनुष्टुप् में, मज्जा द्वारा पंक्ति में। ऐतरेय आरण्यक ३.२.१ के उल्लेख के अनुसार आत्मा में प्राण ऊष्मा रूप, अस्थियां स्पर्श अक्षरों का रूप व मज्जा स्वर रूप है।

     पुराणों में मृ्त्यु पश्चात् गंगा में अस्थि प्रवाह का जो वर्णन है, वैदिक साहित्य में उसका रूप इस प्रकार है कि अस्थियां यज्ञ की समिधाएं हैं(शतपथ ब्राह्मण ९.२.३.४६ इत्यादि)। यज्ञ में कुछ काष्ठ खण्डों पर आज्य/घृत का लेप करके उनके बीच में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। इसी प्रकार अस्थि रूपी समिधाओं पर अस्थियों के अन्दर स्थित मज्जा रूपी आज्य का लेप करके इनके बीच अग्नि को प्रज्वलित करना है।यह अग्नि कौन सी है, इसके विषय में शतपथ ब्राह्मण १०.५.४.१२ का कथन है कि आत्मा ही अग्नि है। शतपथ ब्राह्मण १०.२.६.१२ के अनुसार प्राण जो अमृत है, वही अग्नि है। शतपथ ब्राह्मण १०.१.४.२ के अनुसार मज्जा के लिए अग्नि प्राण है, अस्थि के लिए अग्नि अपान, स्नायु के लिए व्यान, मांस के लिए उदान और मेद के लिए समान है। अस्थि स्वयं में निर्जीव है, उसमें प्राण नहीं है। प्राणों द्वारा, अग्नि द्वारा अमेध्य अस्थि आदि को मेध्य बनाते हैं। मेध्य बनाने पर क्या होगा, इसके बारे में अथर्ववेद ११.१०.२९ मन्त्र का कहना है कि अस्थि को समिधा बनाने पर आठ आपः या जलों का अवतरण होता है। अथर्ववेद ४.१०.७ के अनुसार अस्थि के कृशन(सुवर्ण रूप, कृष्ण रूप?) होने पर वह आपः के अन्त तक जाती है। पैप्पलाद संहिता १६.१३७.८ के अनुसार मज्जा, अस्थि, मांस, रक्त से आमिक्षा, क्षीर, घृत/सर्पि और मधु का दोहन किया जाता है। काठक संहिता १३.२ के अनुसार पुरुष की अस्थियां आग्नेय हैं, अर्थात् उनमें अग्नि को प्रज्वलित करना है। दूसरी ओर मांस वारुण है। उसमें आपः का अवतरण होता है। यह वर्णन मृतक की अस्थियों का गंगा में प्रवाह करने की व्याख्या हो सकता है। शतपथ ब्राह्मण १०.६.४.१ के अनुसार अश्व के मेध्य बनने पर उसकी अस्थियां नक्षत्र बन जाती हैं और मांस नभ का रूप हो जाता है। तैत्तिरीय आरण्यक १.११.३ के अनुसार अन्धस् के द्वारा सारा द्युलोक आवृत होने के कारण सारी रश्मियां लुप्त हो जाती हैं। रात्रि में यह दिखाई पडती हैं और अस्थि से अस्थि(का उदय?) संभव हो सकता है।

     ऋग्वेद १.१६४.४ में प्रश्न किया गया है कि जिस अस्थिवान् का अनस्थि वाला भरण करता है, उसका जन्म होते हुए किसने देखा है। काठक संहिता २४.५ के अनुसार कर्मकाण्ड में घृत में हिरण्य/सुवर्ण का प्रक्षेप किया जाता है। कहा गया है कि यह कर्म गर्भ में अस्थि निर्माण करने का प्रतीक है। ज्योतिष शास्त्र में अस्थियों का कारक पिता व मांस, रुधिर आदि का कारक माता को कहा गया है। इसे आध्यात्मिक रूप में समझने की आवश्यकता है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः ।

जघान नवतीर्नव ॥ऋ. १.८४.१३

को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति ।
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥ऋ. १.१६४.

देवानामस्थि कृशनं बभूव तदात्मन्वच्चरत्यप्स्वन्तः ।

तत्ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय कार्शनस्त्वाभि रक्षतु ॥शौअ .१०.७

रोहण्यसि रोहण्यस्थ्नश्छिन्नस्य रोहणी ।

रोहयेदमरुन्धति ॥शौअ .१२.१

यत्ते रिष्टं यत्ते द्युत्तमस्ति पेष्ट्रं त आत्मनि ।

धाता तद्भद्रया पुनः सं दधत्परुषा परुः ॥४.१२.२ ॥

सं ते मज्जा मज्ज्ञा भवतु समु ते परुषा परुः ।

सं ते मांसस्य विस्रस्तं समस्थ्यपि रोहतु ॥४.१२.३ ॥

मज्जा मज्ञा सं धीयतां चर्मणा चर्म रोहतु ।

असृक्ते अस्थि रोहतु मांसं मांसेन रोहतु ॥४.१२.४ ॥

लोम लोम्ना सं कल्पया त्वचा सं कल्पया त्वचम् ।

असृक्ते अस्थि रोहतु छिन्नं सं धेह्योषधे ॥४.१२.५ ॥

आस्तेयीश्च वास्तेयीश्च त्वरणाः कृपणाश्च याः ।

गुह्याः शुक्रा स्थूला अपस्ता बीभत्सावसादयन् ॥११.(१०).२८

अस्थि कृत्वा समिधं तदष्टापो असादयन् ।

रेतः कृत्वाज्यं देवाः पुरुषमाविशन् ॥११.(१०).२९

अथो श्वा अस्थिरो भवन् ॥२०.१३०.१९ ॥

यत्ते मज्जा यान्यस्थीनि यन्मांसं यच्च लोहितम् ।
आमिक्षां दुह्रतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु ।पैसं. १६.१३७.।।

तिष्ठन्त्समिध आदधाति । अस्थीनि वै समिधस्तिष्ठन्तीव वा अस्थीन्यासीन आहुतीर्जुहोति मांसानि वा आहुतय आसत इव वै मांसान्यन्तराः समिधो भवन्ति बाह्या आहुतयोऽन्तराणि ह्यस्थीनि बाह्यानि मांसानि माश ९.२.३.४६]

द्वितीयां चितिं चिनोति सा हास्यैषापान एव तद्वै तदमृतममृतं ह्यपानः सैषाऽमृतचितिस्तदेतन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति तेनास्यैतदमृतम्भवत्यथ पुरीषं निवपति तद्धास्यैतदस्थ्येव तद्वै तन्मर्त्यं मर्त्यं ह्यस्थि तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति तेनास्यैतदमृतं भवति - १०.१.४.३

तद्वै लोमेति द्वे अक्षरे त्वगिति द्वे असृगिति द्वे मेद इति द्वे मांसमिति द्वे स्नावेतिद्वे अस्थीति द्वे मज्जेति द्वे ताः षोडश कला अथ य एतदन्तरेण प्राणः संचरति स एव सप्तदशः प्रजापतिः माश १०.४.१.१७

आत्मा ह त्वेवैषोऽग्निश्चितः तस्यास्थीन्येव परिश्रितस्ताः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि भवन्ति षष्टिश्च ह वै त्रीणि च शतानि पुरुषस्यास्थीनि मज्जानो यजुष्मत्य इष्टकास्ताः षष्टिश्चैव त्रीणि च शतानि भवन्ति षष्टिश्च ह वै त्रीणि च शतानि पुरुषस्य मज्जानोऽथ या अमूः षट्त्रिंशदिष्टका अतियन्ति यः स त्रयोदशो मास - माश १०.५.४.१२

उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः...... नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसान्यूवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा  माश १०.६.४.१

 मांसेभ्य एवास्योर्गस्रवत्, स उदुंबरोऽभवत्। अस्थिभ्य एवास्य स्वधाऽस्रवत्, स न्यग्रोधोऽभवत्।  - माश १२.७.१.९

अस्थिभ्य एवास्य खदिरः समभवत् तस्मात्स दारुणो बहुसारो दारुणमिव ह्यस्थि
तेनैवैनं तद्रूपेण समर्धयत्यन्तरे बैल्वा भवन्ति बाह्ये खादिरा अन्तरे हि मज्जानो बाह्यान्यस्थीनि स्व एवैनांस्तदायतने दधाति  मांसेभ्य एवास्य पलाशः समभवत् तस्मात्स बहुरसो लोहितरसो लोहितमिव हि मांसं तेनैवैनं तद्रूपेण समर्धयत्यन्तरे खादिरा भवन्ति बाह्ये पालाशऽअन्तराणि ह्यस्थीनि बाह्यानि मांसानि  माश १३.४.४.१०

र्धं वै पुरुषस्याग्नेयमर्धं वारुणमस्थान्याग्नेयानि माँसानि वारुणानि  काठ.सं १३.२

रेतो वै हिरण्यं पशवो घृतं यद्धिरण्यं घृतेऽवदधाति पशुष्वेव रेतो दधाति तस्मादनस्थकाद्रेतसोऽस्थन्वन्तो गर्भाः प्रजायन्ते  काठ सं. २४.५

तस्य यन्माँसमासीत् तद्गुल्गुल्वभवद्यदस्थि स पीतुदारुर्यानि लोमानि स सुगन्धितेजनो  काठक सं २५.६

गायत्रींल्लोमभिः प्रविशामि त्रिष्टुभं त्वचा प्रविशामि जगतीं माँसेन प्रविशाम्यनुष्टुभमस्थ्ना प्रविशामि पङ्क्तिं मज्ज्ञा प्रविशामि ॥ - काठ.सं. ३८.१४

 सौत्रामणेः कौकिल्या अभिषेकः - लोमानि प्रयतिर्मम । त्वङ्म आनतिरागतिः । माँसं म उपनतिः वस्वस्थि । मज्जा म आनतिः तैब्रा २.६.५.

अपागूहत सविता तृभीन् । सर्वान्दिवो अन्धसः । नक्तं तान्यभवन्दृशे । अस्थ्यस्थ्ना संभविष्यामः, इति । - तैआ १.११.३

तस्योष्णिग्लोमानि त्वग्गायत्री त्रिष्टुम्मांसमनुष्टुप्स्नावान्यस्थि जगती पङ्क्तिर्मज्जा प्राणो बृहती  ऐआ २.१.६

तस्यैतस्याऽऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपमस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपं मांसं लोहितमित्येतदन्यच्चतुर्थमन्तस्था रूपमिति ह स्माऽऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः ऐआ ३.२.१

अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ॥ आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् । - सरस्वतीरहस्योपनिषत् ३.२३