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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(Anapatya to aahlaada only)

by

Radha Gupta, Suman Agarwal, Vipin Kumar

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Anapatya - Antahpraak (Anamitra, Anaranya, Anala, Anasuuyaa, Anirudhdha, Anil, Anu, Anumati, Anuvinda, Anuhraada etc.)

Anta - Aparnaa ((Antariksha, Antardhaana, Antarvedi, Andhaka, Andhakaara, Anna, Annapoornaa, Anvaahaaryapachana, Aparaajitaa, Aparnaa  etc.)

Apashakuna - Abhaya  (Apashakuna, Apaana, apaamaarga, Apuupa, Apsaraa, Abhaya etc.)

Abhayaa - Amaavaasyaa (Abhayaa, Abhichaara, Abhijit, Abhimanyu, Abhimaana, Abhisheka, Amara, Amarakantaka, Amaavasu, Amaavaasyaa etc.)

Amita - Ambu (Amitaabha, Amitrajit, Amrita, Amritaa, Ambara, Ambareesha,  Ambashtha, Ambaa, Ambaalikaa, Ambikaa, Ambu etc.)

Ambha - Arishta ( Word like Ayana, Ayas/stone, Ayodhaya, Ayomukhi, Arajaa, Arani, Aranya/wild/jungle, Arishta etc.)

Arishta - Arghya  (Arishtanemi, Arishtaa, Aruna, Arunaachala, Arundhati, Arka, Argha, Arghya etc.)           

Arghya - Alakshmi  (Archanaa, Arjuna, Artha, Ardhanaareeshwar, Arbuda, Aryamaa, Alakaa, Alakshmi etc.)

Alakshmi - Avara (Alakshmi, Alamkara, Alambushaa, Alarka, Avataara/incarnation, Avantikaa, Avabhritha etc.)  

Avasphurja - Ashoucha  (Avi, Avijnaata, Avidyaa, Avimukta, Aveekshita, Avyakta, Ashuunyashayana, Ashoka etc.)

Ashoucha - Ashva (Ashma/stone, Ashmaka, Ashru/tears, Ashva/horse etc.)

Ashvakraantaa - Ashvamedha (Ashwatara, Ashvattha/Pepal, Ashvatthaamaa, Ashvapati, Ashvamedha etc.)

Ashvamedha - Ashvinau  (Ashvamedha, Ashvashiraa, Ashvinau etc.)

Ashvinau - Asi  (Ashvinau, Ashtaka, Ashtakaa, Ashtami, Ashtaavakra, Asi/sword etc.)

Asi - Astra (Asi/sword, Asikni, Asita, Asura/demon, Asuuyaa, Asta/sunset, Astra/weapon etc.)

Astra - Ahoraatra  (Astra/weapon, Aha/day, Ahamkara, Ahalyaa, Ahimsaa/nonviolence, Ahirbudhnya etc.)  

Aa - Aajyapa  (Aakaasha/sky, Aakashaganga/milky way, Aakaashashayana, Aakuuti, Aagneedhra, Aangirasa, Aachaara, Aachamana, Aajya etc.) 

Aataruusha - Aaditya (Aadi, Aatma/Aatmaa/soul, Aatreya,  Aaditya/sun etc.) 

Aaditya - Aapuurana (Aaditya, Aanakadundubhi, Aananda, Aanarta, Aantra/intestine, Aapastamba etc.)

Aapah - Aayurveda (Aapah/water, Aama, Aamalaka, Aayu, Aayurveda, Aayudha/weapon etc.)

Aayurveda - Aavarta  (Aayurveda, Aaranyaka, Aarama, Aaruni, Aarogya, Aardra, Aaryaa, Aarsha, Aarshtishena, Aavarana/cover, Aavarta etc.)

Aavasathya - Aahavaneeya (Aavasathya, Aavaha, Aashaa, Aashcharya/wonder, Aashvin, Aashadha, Aasana, Aasteeka, Aahavaneeya etc.)

Aahavaneeya - Aahlaada (Aahavaneeya, Aahuka, Aahuti, Aahlaada etc. )

 

 

अश्विनौ

टिप्पणी : वेद में अश्विनौ शब्द सदा द्विवचन में प्रयुक्त होता है। यह एक देवमिथुन है। इन्हें देवभिषजौ कहा जाता है। इनके अन्य नाम नासत्य और दस्र आते हैं। वृद्ध से युवा कर देना, टूटी जांघ के स्थान पर लोहे की जांघ लगा देना, अन्धकार से प्रकाश में ले जाना, समुद्र से डूबते को बचा लेना आदि उनके अनेक चमत्कार बताए जाते हैं। अश्विनौ मूलतः अश्व नामक व्यापनशील चेतना की पराक् और अर्वाक् गति के प्रतीक हैं। अश्व जिसका कल नहीं है, जो सदा वर्तमान है। यह पहला अश्व परमात्मा है। उस अश्व में से एक दूसरा अश्व बनाना होता है। उस परमात्मा की शक्ति को लेकर जीवात्मा को अजर-अमर कर देना है। यह दूसरा अश्व है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इन्हें प्राणापानौ कहा गया है। प्राणों की यह पराक् और अर्वाक् गति ही अन्नमय, प्राणमय आदि कोशों को जोडने वाला मानो सेतु तैयार करती है(रामायण में अश्विनौ के अवतार नल-नील तथा मैन्द-द्विविद रामेश्वर सेतु निर्माण करते हैं)। अश्विनौ का रथ तीन चक्रों/पहियों वाला है। दो चक्रों को तो ब्राह्मण लोग ऋतुथा जानते हैं, लेकिन तीसरे को सत्य की खोज करने वाले योगी ही जान सकते हैं। रथ के तीन पहिए हैं एक स्थूल शरीर में, एक सूक्ष्म शरीर में और एक कारण शरीर में। तीनों में एक ही चेतना एक साथ चलेगी। जब तक जीवात्मा अश्व नहीं बनता, तब तक वह अधिक से अधिक मन तक पहुंच सकता है। तब तक रथ के दो ही चक्र हैं स्थूल और सूक्ष्म शरीर। मन ऊर्ध्वमुखी होने पर तीन चक्रों का रथ बन जाता है। समाधि लग जाने पर अश्विनौ दिखाई नहीं पडते। सत्य हिरण्यय कोश है, वही समाधि है। अश्विनौ का नाम नासत्य(न-असत्य) है जो संकेत करता है कि यह समाधि से नीचे की स्थिति है। - फतहसिंह

 

     उत्तरकुरु क्षेत्र में अश्व रूपी सूर्य और अश्वा रूप धारी संज्ञा से अश्विनौ की उत्पत्ति की पौराणिक कथा के संदर्भ में हमें सर्वप्रथम संज्ञा के स्वरूप को समझना होगा। जैमिनीय ब्राह्मण १.२६९ के अनुसार मन रेतस्या बन जाए, प्राण गायत्री, चक्षु त्रिष्टुप्, श्रोत्र जगती, वाक् अनुष्टुप् छन्द बन जाएं, यह संज्ञाएं हैं। जैमिनीय ब्राह्मण २.११५- २.१२१ में वर्णन है कि आदित्यों ने अंगिरसों को श्वेत वडवा लाकर दी, लेकिन अङ्गिरसों ने अस्वीकार कर दिया। तब वह वडवा क्रोध में उभयमुखी सिंही हो गई। बाद में देवों द्वारा उसे स्वीकार कर लेने पर वह उत्तरवेदी बन गई। जब आदित्यों ने श्वेत अश्व के द्वारा स्वर्ग लोक प्राप्त कर लिया तो अङ्गिरसों ने भी श्वेत वडवा को स्वीकार करके स्वर्ग लोक की प्राप्ति की। इस कथानक में जो उत्तरवेदी का उल्लेख है, वह पुराणों का उत्तरकुरु ही है जहां संज्ञा तप करती है(ब्राह्मण ग्रन्थों में आता है कि कुरुक्षेत्र, जो खाण्डव वन का प्रतीक है, देवों की यज्ञवेदी है)। पुराणों में अन्यत्र वडवाग्नि द्वारा समुद्र जल पान का उल्लेख आता है। इन का निहितार्थ यह है कि पृथिवी या संज्ञा का एक रूप वडवाग्नि के रूप में विकसित होकर काल समुद्र का, असुरों का नाश करता है। दूसरा उत्कृष्ट रूप यज्ञ की उत्तरवेदी बनता है। यहीं अश्विनौ का जन्म होता है।

     वैदिक साहित्य में संज्ञा और सूर्य के मिथुन से अश्विनौ की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है। ऋग्वेद १०.१७.१ की ऋचाओं को इस कथा से जोडा जा सकता है। अथर्ववेद ७.५४.१ में अश्विनौ से प्रार्थना की गई है कि वह हमें अपनों से और परायों से संज्ञान प्राप्त कराएं। इसका निहितार्थ होगा कि संज्ञा के विराट रूप संज्ञान को प्राप्त होना ही अश्विनौ का जन्म लेना है। तैत्तिरीय आरण्यक ४.१.१ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.१.१.१ में प्रवर्ग्य नामक यज्ञ का वर्णन है। कहा गया है कि जब यज्ञ रूपी विष्णु का शिर किन्हीं कारणों से कट गया तो देवगण कुरुक्षेत्र में शीर्ष रहित यज्ञ का अनुष्ठान करते रहे जिससे वांछित फलों की प्राप्ति नहीं हुई। तब अश्विनौ सर्वता की प्राप्ति के लिए यज्ञ के अध्वर्यु नामक ऋत्विज बने  और दधीचि से प्राप्त मधु विद्या द्वारा यज्ञ के शीर्ष को जोडा(बृहदारण्यक उपनिषद २.५.१९ में दधीचि बताते हैं कि मधु विद्या क्या है? रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव इत्यादि, अर्थात् कण-कण में उसी परमात्मा के रूप का दर्शन करना मधु विद्या है)। इस यज्ञ में अध्वर्यु ऋत्विज यजमान रूपी सूर्य के तेज का क्रमशः विकास करता है। उस सूर्य को आकाश में विचरण करने योग्य, पतन रहित, १२ मास के १२ सूर्यों और १३वें मास के सूर्य को धारण करने वाला, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ऋतुओं को धारण करने वाला बनाते हैं। दूसरी ओर, प्रतिप्रस्थाता(अध्वर्यु ऋत्विज का एक सहायक, आसुरी पक्ष), आग्नीध्र(प्रस्तुत कथा में त्वष्टा का रूप, तैत्तिरीय आरण्यक ३.३.१) तथा अन्य ऋत्विज यजमान-पत्नी या पृथिवी को दसों दिशाओं में व्याप्त होने वाली, मनु को वहन करने वाली अश्वा का रूप देते हैं। सूर्य के तेज(जिसे इस यज्ञ में घर्म या प्रवर्ग्य कहते हैं) का विकास पूर्ण हो चुकने पर यज्ञ में काम आने वाले मिट्टी से निर्मित महावीर पात्र तथा अन्य सहायक उपकरणों जैसे परीशास(संडासी) आदि को उत्तरवेदी में स्थापित कर दिया जाता है(तुलनीय : पुराणों में अश्विनौ द्वारा मिट्टी का शिवलिंग बनाना)। यज्ञ रूपी उत्तरवेदी में महावीर शिर का प्रतीक है। परीशास आदि यज्ञ के उपकरणों से शरीर की बाहुओं आदि का प्रतीक लिया जाता है। कहा गया है कि प्रत्येक यज्ञ का एक शीर्ष होता है जैसे अग्निहोत्र में आहवनीय अग्नि शीर्ष है, दर्श-पूर्णमास यज्ञ में आज्यभाग-द्वय व पुरोडाश शीर्ष हैं, सोम यज्ञ में हविर्धान यज्ञ का शीर्ष है, चातुर्मास्य में पयस्या यज्ञ की शीर्ष है(शतपथ ब्राह्मण १४.२.२.४८)। अतिथि को भी यज्ञ का शीर्ष कहते हैं। लेकिन प्रवर्ग्य नामक इस देवों के यज्ञ में अश्विनौ अध्वर्युओं द्वारा स्थापित शीर्ष अन्य सब यज्ञों को समाहित करता है।

     पुराणों में अश्व रूपी सूर्य और अश्वा रूप धारी संज्ञा के मिथुन से जो अश्विनौ की उत्पत्ति कही गई है, इस संदर्भ में प्रश्न उठता है कि सूर्य अश्व कब बनता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है कि सायंकाल होने पर सूर्य अश्व बनकर आहवनीय अग्नि में प्रवेश कर जाता है। इसके अतिरिक्त, अमावास्या काल में भी सूर्य अश्व रूप में रहता है। चूंकि अमावास्या तथा सायंकाल से आगे रात्रि को समाधि की अवस्था कहा जा सकता है, अतः पुराणों का यह कथन तर्कसंगत है कि कार्तिक शुक्ल द्वितीय को अश्विनौ का जन्म हुआ। शुक्ल पक्ष समाधि से व्युत्थान का प्रतीक हो सकता है।

       शतपथ ब्राह्मण १२.७.१.१ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.१.१ में सौत्रामणी यज्ञ का वर्णन किया गया है। आख्यान है कि इन्द्र ने त्वष्टा विश्वरूप का वध करके उसके यज्ञकलश में उपलब्ध समस्त सोम को पी लिया था। वह सोम इन्द्र के विभिन्न अङ्गों से विभिन्न हिंसक पशुओं के रूप में प्रकट हुआ। अश्विनौ और सरस्वती ने उसकी चिकित्सा की। अश्विनौ के चरित्र में भेषज्य कर्म को समझना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जिस सोमरस का, भक्तिरस का, आह्लाद का इन्द्र ने अचानक पान किया है, वह उसे आत्मसात् करने में समर्थ नहीं हो रहा है। अतः वह आह्लाद नमुचि असुर के रूप में(नमुचि अर्थात् जो एक बार पकड कर मुक्त न करे) तथा हिंसक प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट हो रहा है। उस शक्ति को प्रवाहित होने का सम्यक् मार्ग कैसे दिया जाए? शांखायन ब्राह्मण १८.१ के अनुसार यह जो अतिरिक्त सोम है, यह आश्विन है। अश्विनौ के पास इसकी भेषज यह है कि वह इसे ओंकार रूपी रथ पर आरूढ करके उसका वहन करते हैं। वेद मन्त्र अश्विनौ के रथ के उल्लेखों से भरे पडे हैं। अश्विनौ और सरस्वती को भेषज कर्म में साथ-साथ क्यों रखा गया है, इसका उत्तर इस प्रकार हो सकता है कि वैदिक भाषा में भक्ति के मुख्य रूप से चार प्रकार होते हैं : हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ और प्रतिहार। इनसे सम्बन्धित पशु क्रमशः अज, अवि, गौ और अश्व हैं। ऋतुओं की दृष्टि से यह चार अवस्थाएं वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा व शरद होती हैं(जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण १.३.२.७)। इनमें अज अवस्था अश्विनौ का(शतपथ ब्राह्मण १२.७.१.११) और अवि अवस्था सरस्वती का ग्रह है, वह यहां आकर स्थित हो सकते हैं। अग्नि के वाहन अज रूपी तेज का विकास प्रतिहार अवस्था में चक्षु के तेज के रूप में हो जाता है, ऐसा चक्षु जिसे कण-कण में उस परमात्मा का ही रूप दिखाई पडने लगे(जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण १.१८.२.९ में अश्विनौ को शरद या प्रतिहार कहा गया है)। प्रतिहार से अगली निधन अवस्था में चक्षु ग्रह के बदले श्रोत्र ग्रह बन जाता है। यही कारण है कि ब्राह्मण ग्रन्थों में अश्विनौ के ग्रह का उल्लेख कहीं छाग, कहीं चक्षु तो कहीं श्रोत्र है(शतपथ ब्राह्मण १२.८.२.२२, ४.१.५.१ आदि)। पुराणों में अश्विनौ की कपिला गौ के कर्णों में स्थिति कही गई है। उन्हें कर्णवेध संस्कार करने वाला कहा गया है। सरस्वती के ग्रह अवि को वीर्य(वीर स्थिति?) से जोडा गया है जिसका विकास प्राण, अपान, उदान, व्यान आदि अन्य रूपों में होता है(शतपथ ब्राह्मण १२.८.२.२२)। योग की दृष्टि से अवि को असि और वरणा नदियां अथवा इडा या पिङ्गला नाडियां कहा जा सकता है जिनके मिलने से तीसरी सरस्वती या सुषुम्ना नाडी का विकास होता है। डा. फतहसिंह के अनुसार अन्य सब नाडियां तो पर्वतों से निकल कर समुद्र में विलीन होती हैं, लेकिन सरस्वती नदी ऐसी है जो विज्ञानमय कोश रूपी सिन्धु से निकलती है। ऋग्वेद ५.७५.२ तथा ८.२६.१८ से ऐसा प्रतीत होता है कि यह सरस्वती या सुषुम्ना या सिन्धु नदी ऐसी है जो हिरण्यवर्तनी है, हिरण्यय कोश के, समाधि अवस्था के बार-बार चक्कर लगाती रहती है और अपने साथ अश्विनौ को भी ले जाती है और रस का आस्वादन कराती है। ऋग्वेद ८.२६.१५ आदि कईं ऋचाओं में अश्विनौ से इस नृ प्राणों का उद्धार करने वाली वर्ति में हमें स्थापित करने की प्रार्थना की गई है। इसके अतिरिक्त, ऋग्वेद १.११६.१४ आदि में उल्लेख है कि अश्विनौ ने वर्तिका को वृक के मुख से बचाया। यह वर्तिका, दीपक की बत्ती यही सरस्वती नाडी प्रतीत होती है। अश्विनौ का तेज उसे जलाता है। इसके अतिरिक्त, अश्विनौ और सरस्वती का एक और सम्बन्ध विचारणीय है। तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.४.६ तथा शतपथ ब्राह्मण १२.९.१.४ में उल्लेख है कि अश्विनौ ने तो अङ्गों की चिकित्सा आत्मा में की(?) तथा सरस्वती ने आत्मा को अङ्गों से युक्त किया/अङ्गों द्वारा धारण किया(अथर्ववेद ११.९.६ के अनुसार यज्ञ के अङ्गों का निर्माण उच्छिष्ट से, अतिरिक्त शक्ति से होता है)। इसके अतिरिक्त, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.१२.६ तथा २.६.१२.३ में प्रार्थना की गई है कि दिवस काल में अश्विनौ और रात्रि काल में सरस्वती हमारी रक्षा करें। ऋग्वेद की कईं ऋचाओं में अश्विनौ के रथ को प्रातःकाल में जुडने वाला कहा गया है जो उषा को अपने रथ पर बैठा कर ले जाते हैं।

     महाभारत आदि में अश्विनौ का अवतार अश्वों के विशेषज्ञ नकुल और गायों के विशेषज्ञ सहदेव के रूप में होने के संदर्भ में यह प्रतीत होता है कि भक्ति में अज और अवि अवस्था को पार करने के पश्चात् गौ और अश्व अवस्थाएं परस्पर मिश्रित हैं। ऋग्वेद २.४१.७ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.१३.३ में अश्विनौ के गोमत् और अश्ववत् होने का उल्लेख है। जब वह गोमत् होंगे तब उनका नाम नासत्य होगा और वह इन्द्रियों की पुष्टि गौ प्राणों द्वारा करेंगे। उनका रथ अरिष्टनेमि प्रकार का होगा(ऋग्वेद १.१८०.१०)। विराट के राज्य में सहदेव का नाम भी अरिष्टनेमि ही है। जब वह अश्वावत् होंगे तो उनका नाम अश्विनौ होगा और वह वीर्य और बल की पुष्टि करेंगे। जैसे अश्विनौ रूपवान् हैं, ऐसे ही नकुल व सहदेव भी बहुत रूपवान् हैं, विशेषकर नकुल, क्योंकि स्वर्गारोहण के समय जब नकुल मृत होकर गिर पडता है तो युधिष्ठिर उसका कारण बताते हैं कि इसको अपने रूप पर गर्व था। सहदेव के मृत होने पर उन्होंने कहा कि इसको अपनी प्रज्ञा पर गर्व था। कौशीतकि उपनिषद ३.४ में उल्लेख है कि प्रज्ञा द्वारा ही चक्षु पर आरूढ होकर सब रूपों के दर्शन करता है। अतः गौ और अश्व को या नकुल और सहदेव को एक दूसरे से अलग करके देखना कठिन है।

     वराह पुराण में प्राण-अपान का प्रजापति के शरीर को त्यागना और फिर द्वितीया तिथि को अश्विनौ के रूप में पुनः शरीर धारण करने के संदर्भ में अथर्ववेद ७.५५ का अश्विनौ देवता का सूक्त विचारणीय है(ऊपर प्राण-अपान का सम्बन्ध सरस्वती से जोडा गया है)। इसके अतिरिक्त, वैदिक तथा पौराणिक वाङ्मय में सार्वत्रिक रूप से उल्लेख आता है कि सवितुः प्रसवितृभ्यां अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णोः हस्ताभ्यां इत्यादि(शतपथ ब्राह्मण ६.४.१.१ आदि)। ऐसा प्रतीत होता है कि सविता से सव प्राप्त करना ही अश्विनौ का सर्व बनना है। अश्विनौ उस शक्ति को पूषा रूपी वत्स को देते हैं जो उस शक्ति का सर्वत्र च्यावयन करता है, उसे वितरित करता है(ऋग्वेद १०.१७.१)। अश्विनौ के संदर्भ में च्यवन ऋषि की कथा पर इसी दृष्टिकोण से विचार करने की आवश्यकता है। पुराणों में जहां च्यवन नाम आता है, वैदिक ऋचाओं में इसे च्यवानं कहा गया है(उदाहरणार्थ ऋग्वेद १०.१७.१)। शतपथ ब्राह्मण ४.१.५.१ में आश्विन् ग्रह के संदर्भ में च्यवन-सुकन्या  आख्यान का वर्णन किया गया है। ऋग्वेद १०.१३१.५ में अश्विनौ को पितरद्वय कहा गया है जो सोम के कच्चे रूप सुरा को पीकर अपने यजमान रूपी पुत्र इन्द्र की रक्षा करते हैं। यह संदर्भ आश्विन् मास के कृष्ण पक्ष की पितृ पक्ष के रूप में प्रतिष्ठा के कारणों पर विचार करने के लिए उपयोगी है।

अश्विनौ द्वारा देवों के यज्ञ का शिर जोडना

स होवाच। शिरो वा एतद्यज्ञस्य। यद् व्रतम्। आत्मा दीक्षा। एतत् खलु वै व्रतस्य रूपम्। यत् सत्यम्। एतद्दीक्षायै। यत् श्रद्धा। मनो यजमानस्य रूपम्। वाग् यज्ञस्येति॥माश १२.८.२.४॥ स यत् वाचा व्रतमुपैति। आत्मन्येवैतद्यज्ञस्य शिरः प्रतिदधाति। सत्यं श्रद्धायां दधाति। यजमानं यज्ञे॥१२.८.२.५

 

अश्विनौ द्वारा दधीचि से मधुविद्या का ग्रहण

दध्यङ आथर्वण या दधीचि ऋषि की विशेषता यह है कि सारे देवों ने निधान रूप में अपने अस्त्र दधीचि के पास रख दिए और दधीचि ने उन अस्त्रों का तेज अपनी अस्थियों में समाहित कर लिया। बाद में दधीचि ने अश्वमुख से अश्विनौ को मधुविद्या का उपदेश दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि मधुविद्या ग्रहण करने के लिए तेज को अपनी अस्थियों में आत्मसात् करना पहला चरण है। अश्विनौ में यह विशेषता है कि उनमें से एक गायों का विशेषज्ञ है। गौ की विशेषता सूर्य के तेज को आत्मसात् करने, उसका नए प्रकार से उपयोग करने में है।

 

     श्री कृष्णस्वामी अय्यर द्वारा प्रस्तुत तथा चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस द्वारा ई. सन् १९७५ में प्रकाशित शोध प्रबन्ध वेदे अश्विनौ उल्लेखनीय है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अश्विन

१. अथ यदेनं( अग्निम् ) द्वाभ्यां बाहुभ्यां द्वाभ्यामरणीभ्यां मन्थन्ति द्वौ वा अश्विनौ तदस्याश्विनं रूपम् । ऐ , ।।

२. अश्विना आशिरा ( प्रीणामि ) । मै १, , ; काठ ९, १० ।।

३. अश्विना उ ह वै देवानां बद्धमुचौ । जै , ७२ ।।

४. अश्विना (नौ [काठ.]) एतस्य देवते (ता [काठ.J) य आमयावी । मै २, ,; काठ १३,७।

५. अश्विनावंसाभ्याम् ( प्रीणामि )। तैसं ५, , १३, १ ।।

६ अश्विनाविव रूपेण ( भूयासम् ) । मै २, , १४ ।।

७. अश्विनावेतस्य देवता य आनुजावरः । क ४६, ६ ।

८. अश्विनावेतस्य देवता यो दुर्ब्राह्मणः सोमं पिपासति । तैसं , , १०, ।।

९. अश्विनोस्त्वा तेजसा ब्रह्मवर्चसायाभिषिञ्चामि । मै ३, ११, ८।।

१०. अश्विनौ देवता पङ्क्तिश्छन्दोऽश्विनोः पात्रमसि । तैसं ३, , , २ ।

११. अश्विनौ द्व्यक्षरया ( रेण [तैसं.]) प्राणापाना उदजयताम् ( नावुद तैसं.)। तैसं १, ,११, ; मै १,११,१०; काठ १४,४ । ।

१२. अश्विनौ पूर्वपादौ- - -- - मित्रावरुणावपरपादौ । तै २,१९,२।

१३. अश्विनौ वै देवानामनुजावरौ ( अत्यन्तनिकृष्टौ )। तैसं २,,,; मै २,,; काठ १३, ; ३०, ; क ४६, ६ ।।

१४. अश्विनौ वै देवानां भिषजौ । तैसं २,,११, २-३; मै २,,; ,,; ,,; ऐ १,१८; कौ १८, ; गो २, ,; , १०; तै १, , , ; तैआ ५, , ३ ।

१५. अश्विनौ (द्यावापृथिवी) व्यात्तम् (विकासितमुखस्थानीये )। तैआ ३, १३, ३ ।

१६. अश्विनौ हि (वै [मै.) देवानामध्वर्यू । मै ४,,; तैआ ५, , ५ ।

१७. अश्विनौ ह्यभिषज्यताम् । मै २,, ; काठ १२, १० । ।

१८. अश्विभ्यां (+ आगोमुग्भ्यां तैसं.; मै. ) धानाः। तैसं ७, ,२२, ; मै ३,१५, ११;

तै १, , ११, ३ ।।

१९. अश्विभ्यां मयूरान् ( आलभते ) । मै ३, १४, ४ ।।

२०. इन्द्रे हि तौ ( अश्विनौ ) तानीन्द्रियाणि वीर्याण्याप्त्वाधत्ताम् । मै २, , १ ।।

२१. इमे ( द्यावापृथिव्यौ ) अश्विना । तैसं ५,,,; काठ २२, ६ ।।  

२२. इमे ह वै द्यावापृथिवी प्रत्यक्षमश्विनाविमे हीदं सर्वमाश्नुवातां पुष्करस्रजावित्यग्निरेवास्यै ( पृथिव्यै ) पुष्करमादित्योऽमुष्यै ( दिवे ) । माश ४, , , १६ ।

२३. गर्दभरथेनाश्विना उदजयताम् । ऐ ४, ९।।

२४. छागमश्विभ्यां स्वाहा। मै ३, ११, २ ।।

२५. तदश्विना उद्जयतां रासभेन । कौ १८, १।

२६. तद्यौ ह वाऽइमौ पुरुषाविवाक्ष्योः । एतावेवाश्विनौ । माश १२, , , १२ ।

२७. तयोर् (अश्विनोः) या भिषज्या तनूरासीत्तां त्रेधा विन्यदधाताम् , अग्नौ तृतीयं, ब्राह्मणे तृतीयमप्सु तृतीयम् । काठ २७, ४ ।।

२८. तेषाम् ( देवानाम् ) अश्विनौ प्रथमावधावतान्तावन्ववदन् सह नोऽस्त्विति । तावब्रूताङ्किन्नो ततः स्यादिति यत्कामयेथे इत्यब्रुवं स्तावब्रूतामस्मद्देवत्यमिदमुक्थमुच्याता इति तस्मादाश्विनमुच्यते । तां , , ३६ ।।

२९. त्रिबन्धुरेण त्रिवृता रथेन त्रिचक्रेण सुवृता यातमर्वाक् । पिन्वतं गा जिन्वतमर्वतो नो वर्धयतमश्विना वीरमस्मे । काठ १७, १८ ।।

३०. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे । अश्विनोर्बाहुभ्याम् । तै , , ,

३१. देवा असुरैर्विजयमुपयन्तोऽश्विनोः पूषणि सत्यं न्यदधत । मै ,,।।

३२. नासिके (द्यावापृथिवी वा [काठ.J) अश्विनौ । काठ १३, ५। माश १२, , , १४ ।।

३३. पातं नो अश्विना दिवा, पाहि नक्तं सरस्वति । मै ३, ११, ; काठ ३८, ८ , वा.सं. २०.६२

३४. पुत्रमिव पितरा अश्विनोभेन्द्रावतं काव्यैर्दंसनाभिः । काठ १७, १९ ।

३५. प्रत्यूहताम् ( प्रत्यौह तैसं., काठ.] ) अश्विना मृत्युमस्मात् (+......ता अस्मान् मृत्युं प्रत्यूहतः मै.] )। तैसं ४, , , , ,,,; मै ३, , , काठ १८, १६ ।।

३६. भद्राश्विना नो भवतां नवेदसा। काठसंक ६१ : १२ ।।

३७. मुख्यौ वाऽश्विनौ ( यज्ञस्य ) । माश ४, , , १९ ।।

३८. यत्राश्विनोश्छागस्य हविषा प्रिया धामानि । काठ १८, २१ ।

३९ यदश्विना उदजयतामश्विनावाश्नुवातां तस्मादेतदाश्विनमित्याचक्षते । ऐ ,

४०. 'युवं  सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्' (मा १०, ३३) इत्याश्राव्याहाश्विनौ सरस्वतीमिन्द्रं सुत्रामाणं यजेति । माश , , , २५।।

४१. श्येताविव ह्यश्विनौ । माश , , ,

४२. श्रुतसदसि श्रोत्रपाभ्यां (अश्विभ्याम् ) त्वा- - - -(गृह्णामि )। तैसं ३, , १०,१।

४३. श्रोत्रे अश्विनौ । माश १२, , , १३ ।।

४४. सङ्ग्रहीतुर्गृहान् परेत्याश्विनं द्विकपालं पुरोडाशं निर्वपति, सयोनी वाऽश्विनौ, सयोनी सव्यष्ठृसारथी, समान ह्येव रथमधितिष्ठतः । माश ५, , , ८।।

४५. सजोषा अश्विना दँसोभिःघृतेन स्वाहा । मै २, १२,; ,, ; काठ २२,

४६. सतीनामष्टाकपालोऽश्विभ्याम् । मै २, , १३ ॥

अहोरात्रे वाऽश्विनौ । - मै ३.४.४

अश्विना ब्रह्मणा यातमर्वाञ्चो वषट्कारेण यज्ञं वर्धयतौ अ. ५.२६.१२

अश्विनोः पादाभ्यां (ब्रहमौदनं प्राश्नामि) अ. ११.४.४६

अश्विना गोभिरिन्द्रियम् अश्वेभिर्वीर्यं बलम् हविषेन्द्रँ सरस्वती । यजमानमवर्धयन् ता नासत्या सुपेशसा हिरण्यवर्तनी नरा सरस्वती हविष्मती ।इन्द्र कर्मसु नोऽवत। तैब्रा. २.६.१३.

देव इन्द्रो वनस्पतिः हिरण्यपर्णो अश्विभ्याम् सरस्वत्याः सुपिप्पलः इन्द्राय पच्यते मधु - तैब्रा. २.६.१४

अश्विना गोभिरिन्द्रियं अश्वेभिर्वीर्यं बलं वा.सं. २०.७३

अश्विनौ वै देवानां भिषजौ। ताभ्यामेवैनं भिषज्यति। सरस्वती भेषजम्। तयैवास्मिन् भेषजं माश १२.७.२.३

सर्व आश्विना भवन्ति। भैषज्याय। सर्वे सारस्वताः। अन्नाद्यस्यैवावरुद्ध्यै। - १२.८.२.१६

अश्विना तेजसा चक्षुः प्राणेन सरस्वती वीर्यम् वा.सं. २०.८०

अश्विना अंसाभ्याम् (प्रीणामि) मै ३.१५.३

अश्विनावध्वर्य्यू। मै १.९.१, २.८.१, काठ ९.८, ऐ १.१८, गो २.२.६, तौ ३.२.२.१, माश १.१.२.१७, ३.९.४.३, तैआ ३.३.१

अश्विनाऽऽध्वर्यवम् मै ४.१३.८

अश्विनौ द्व्यक्षरया प्रमामन्तरिक्षम् (उदजयताम्)। - मै १.११.१०, काठ १४.४

अश्वयुजौ नक्षत्रमश्विनौ देवता । तै.सं. ४.४.१०.३, मै २.१३.२० (तु. काठ ३९.१३)

अश्विनोरश्वयुजौ । ग्रामः परस्तात्सेनावस्तात् - तै १.५.१.५, ३.१.२.१०

सरस्वती योन्यां गर्भमन्तः अश्विभ्यां पत्नी सुकृतं बिभर्ति अपाँ रसेन वरुणो न साम्ना इन्द्रँ श्रियै जनयन्नप्सु राजा - तै.ब्रा. २.६.४

सरस्वती योन्यां गर्भम् अन्तर् अश्विभ्यां पत्नी सुकृतं बिभर्ति ।
अपाम्̐ रसेन वरुणो न साम्नेन्द्रम्̐ श्रियै जनयन्न् अप्सु राजा ॥ - वा.सं. १९.९४

हविर्धानं यद् अश्विनाग्नीध्रं यत् सरस्वती ।
इन्द्रायैन्द्रम्̐ सदस् कृतं पत्नीशालं गार्हपत्यः ॥ - वा.सं. १९.१८

अश्विभ्यां प्रातःसवनम् इन्द्रेणैन्द्रं माध्यन्दिनम् ।
वैश्वदेवम्̐ सरस्वत्या तृतीयम् आप्तम्̐ सवनम् ॥ - वा.सं. १९.२६

आश्विन

१. आश्विनः (प्रवर्ग्यः ) पयस्यानीयमाने ( नामाधत्त )। तैआ ५, ११, ४ ।।

२. आश्विनं दुह्यमानम् ( पयः ) --- --  वारुणमधिश्रितम् । मै ,,१०

३. आश्विनं (नो [काठ.1) द्विकपालं (लः । मै,, काठ.1) संग्रहीतुर्गृहे सवात्यौ दक्षिणा । तैसं १, , , ; मै २, , ; काठ १५, ४ ।

४. आश्विनं द्विकपालं (+ पुरोडाशं [माश.] ) निवपेत् (निर्वपति [माश.J) । तैसं २, , ,; माश ५, , , ८ ।

५. आश्विनं धूम्रमालभते (मालभेत+यो दुर्ब्राह्मणः सोमं पिपासेत् । तैसं २, , १०, १) , तैसं १, , २१, ; तै १, , , ६ ।।

६. आश्विनमन्वाह तदमुं लोकम् (दिवम् ) आप्नोति । कौ ११,; १८, २ ।।

७. आश्विनः ( ग्रहः ) श्रोत्रम् । मै ४, , ९।।

८. आश्विना अधोरामौ बाह्वोः । मै ३, १३, २।।

९. आश्विनो दशमो गृह्यते, व्यानो वा एष गृह्यते, नाभिरेव दशमो (ग्रहः) गृह्यते । मै ,,।।

१०. आश्विनो द्विकपालः (पुरोडाशः )। तां २१, १०, २३ ।

११. इममेव लोकमाश्विनेन ( अवरुन्धे ) । माश १२, , , ३२ ।

१२. कुवलसक्तुभिराश्विनं ( ग्रहं ) श्रीणाति । मै २, , ; काठ १२, १० ।

१३. द्वाभ्यां ह्याश्विनमित्याख्यायते । कौ १८,५।।

१४. धानामाश्विनस्य ( पात्रेऽवदधाति ) । काठ २७,५ ।

१५. यः पश्चात् सोमपीथः स आश्विनाग्रान् ( ग्रहान् गृह्णीत ) पश्चेव ह्येतौ (अश्विनौ) सोमपीथमाश्नुवाताम् । मै , , ।।

१६. लोपाश (श्रोत्रम् [कौ.1) आश्विनः । मै ३, १४, १७; कौ १३,५।

१७. लोहित ( अजः ) आश्विनो भवति । माश ५, , , १ ।

१८. वसन्तग्रीष्मावेवाश्विनाभ्याम् ( अवरुन्धे )। माश १२, , , ३४।।

१९. शुद्धवालस्सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त आश्विनाः । मै ३, १३, ; काठ ४९,३ ।

२०. श्रोत्रं वा आश्विनः । काठ २७, ; क ४२, ५। ।

२१. श्रोत्रं चात्मा चाश्विनः । काठ २७, ; क ४२, ; , २६

२२. श्रोत्रं त आश्विनः ( ग्रहः ) पातु । मै ४, , ७ ।

२३. सर्व आश्विना भवन्ति ( प्रैषाः ) भैषज्याय । माश १२,,,१६ ।

२४. सर्वत आश्विनं परिहारं भक्षयति, तस्मात् सर्वाः दिशः शृणोति । मै ४,,१ ।

२५. हिङ्कारेणाश्विनः सामन्वान् । मै ४, , १ ॥ [ न- अज- १५; अध्वर्यु- १४ द्र.]